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श्रेणी – 1

सूत्र विभाग

'जैन' का अर्थ क्या है ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)

1. जो सच्चे देव, गुरू और धर्म के स्वरूप को जानता है,
2. तीर्थंकर की आज्ञा को यथाशक्ति अपनाता है,
3. जो क्रोध, मान, माया और लोभ इन चार कषायों को जीतने का प्रयत्न करता हो, उसे ‘जैन’ कहते हैं ।

जैन धर्म में भगवान किसे कहते हैं ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)

जैनों ने भगवान के दो भेद किये हैं-
1. शरीर सहित / सशरीरी भगवान – अरिहंत, तीर्थंकर
2. शरीर रहित / अशरीरी भगवान – सिद्ध भगवान ।

अरिहंत भगवान

अरिहंत और सिद्ध में बड़े कौन हैं ? और क्यों ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)

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देहरहित सिद्ध भगवान बड़े हैं, क्योंकि उन्होंने आठ कर्मों को क्षय (नष्ट) करके मोक्ष प्राप्त किया हैं, जबकि अरिहंत भगवान ने चार घाती कर्मों को (ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अंतराय) क्षय किया है और शेष चार अघाती कर्मों को (वेदनीय, आयुष्य, नाम, गोत्र) क्षय करके मोक्ष में जायेंगे । बाकी केवलज्ञान, केवलदर्शन इन गुणों में दोनों समान है ।

नमस्कार सूत्र में किसका समावेश किया गया हैं ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
नमस्कार सूत्र के पाँच पदों में बडे़ गुणीजनों का समावेश किया गया है । जो नमस्कार करने योग्य हैं 1. अरिहंत 2. सिद्ध 3. आचार्य 4. उपाध्याय और 5. लोक में विराज रहे सभी साधु-साध्वी जी को पंचपरमेष्ठी भगवान कहा गया है और उन्हें नमस्कार किया गया है ।
ये पाँच भगवान कैसे हैं ? ये भगवान परम उपकारी हैं, परम हितकारी है, परम सुखकारी हैं ।
नमस्कार सूत्र में सिद्ध के बदले अरिहंत को पहले नमस्कार क्यों किया जाता है ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
नमस्कार सूत्र में अरिहंत का (तीर्थंकर) पद पहला है । क्योंकि अरिहंत 1. स्वयं संसार से तिरकर दूसरों को संसार से तिरने का सच्चा मार्ग बताते हैं, 2. सिद्ध भगवान की पहचान अरिहंत कराते हैं। इसलिए हम सब पर अरिहंत भगवान का बहुत उपकार है । गुणो की दृष्टि से सिद्ध भगवान बड़े है ।
तीर्थंकर किसे कहते हैं ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
तीर्थ की स्थापना करने वाले को ‘तीर्थंकर’ कहा जाता है । उन्हें अरिहंत या जिनेश्वर भी कहा जाता है । hjp1-8-1 copy
'तीर्थ' का अर्थ क्या हैं ? 'तीर्थ' कितने हैं ? उनमें किसका समावेश होता है ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
जिसकी स्थपना तीर्थंकर करते हैं वह ‘तीर्थ’ है । ‘तीर्थ’ चार है – साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका । इसका दूसरा नाम “चतुर्विध संघ” है  ।
वर्तमान में तीर्थंकरों की उपस्थिति नहीं है तो जैन धर्म कैसे चल रहा है ?(पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
वर्तमान में तीर्थंकरों की उपस्थिति नहीं है, परन्तु पूज्य आचार्य, उपाध्याय, साधु, साध्वीजी और भगवान महावीर द्वारा प्ररूपित उपदेश 32 आगम के रूप में (शास्त्र/पुस्तकें) उपलब्ध हैं, उनके आधार पर जैन धर्म चल रहा है ।
आचार्य किसे कहते हैं ?(पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
जो साधु स्वयं पाँच आचार पालते हैं, अन्य को पालने के लिए प्रेरित करते हैं तथा चतुर्विध संघ का नेतृत्व करते हैं, उन्हें आचार्य कहते हैं । hjp1-8-2 copy
उपाध्याय किसे कहते हैं ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
जो साधु स्वयं 32 (बत्तीस) जैन आगमों (शास्त्रों) को पढ़ते हैं और दुसरे को पढाते है, उन्हें उपाध्याय कहते हैं । hjp1-8-3 copy
साधु साध्वी जी किसे कहते हैं ?(पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
1. जो भाई/बहन संसार का त्याग करके संयम अंगीकार करते हैं
2. समकित सहित पाँच महाव्रत को धारण करते हैं
3. जिनमें दया, क्षमा, संतोष, विनय, सहनशीलता अदि गुण हों
4. जो हिंसा नहीं करते
5. झुठ नहीं बोलते
6. जो चोरी नहीं करते
7. रात्री भोजन और 18 पापों का त्याग करते हैं । एसे पुरूष को साधु और स्त्री को साध्वीजी कहते हैं ।
हमारे धर्मगुरू कौन है ?(पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
संयम मार्ग पर चलने वाले स्थानकवासी जैन साधु साध्वी हमारे धर्मगुरू कहलाते हैं -
1. वे श्वेत (सफेद) वस्त्र पहनते है ।
2. जीवों की रक्षा के लिये हाथ में रजोहरण रखते हैं ।
3. मुँह पर मुँहपति बाँधते है ।
4. सिर के बालों को हाथ से खींचकर, लोच करते है ।
5. गाँव-गाँव नंगे पैर चलकर लोगों को धर्म तथा नीति का उपदेश देते है ।
6. संयम की रक्षा के लिए तथा जीवन निर्वाह के लिए घर-घर गोचरी (भिक्षा) लेने जाते हैं । हमारे धर्मगुरू ऐसे महान है ।
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इन धर्मगुरूओं के और क्या-क्या नाम है ?(पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
मुनि, श्रमण, अणगार, निर्ग्रंथ ऐसे अनेक नाम है ।
नमस्कार सूत्र की विशिष्टता क्या है ? इस सूत्र का स्मरण कब कर सकते है ?(पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
नमस्कार सूत्र की विशिष्टता
1. नमस्कार सूत्र में किसी व्यक्ति को नमस्कार नहीं किया गया है, परन्तु जिन्हों ने गुणों की प्राप्ति की है, उन्हें नमस्कार किया है ।
2. “धर्म के मूल विनय है” यह समझाने के लिए पाठ में पहला शब्द “नमो” दिया गया है ।
3. नमस्कार सूत्र ‘शाश्वत’ है, यह सूत्र जैन धर्म का महामंत्र है ।
इस नमस्कार सूत्र को सोते , उठते, खाते पीते, बाहर जाते, किसी भी कार्य की शुरूआत में, किसी भी समय और किसी भी स्थान पर भावपूर्वक स्मरण किया जा सकता है ।
हम नमस्कार सूत्र क्यों बोलतें है ? इसके स्मरण से किसे लाभ हुआ ?(पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
1. नमस्कार सूत्र हमारे धर्म का मुख्य सूत्र है, इसलिए इसे श्रद्धा के साथ बोलना चाहिए
2. नमस्कार सूत्र का पठन करने से भव-भव के पाप धुल जाते हैं ।
3. मन आनंद में रहता है।
4. अच्छी गति (सुगति) मिलती है।
5. इस सूत्र के स्मरण से उन उपकारी गुणीजनों के उपकार और गुणों की याद आती है । उनके जीवन और शक्ति की याद आती है ।
6. संसार को पार किया जाता है ।
सुदर्शन सेठ, अमरकुमार आदि को नमस्कार सूत्र के स्मरण से लाभ हुआ था ।
नमस्कार सूत्र के पाँच पदमें से प्रत्येक पद में कितने गुण हैं? इनमें देव पद और गुरू पद कितने हैं ? किसके कितने कर्म शेष हैं ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
नमस्कार सूत्र के समस्त पदों को मिलाकर कुल गुण 108 हैं । इसलिए माला में 108 मनके होते हैं। पाँच पद के गुण, देव या गुरू कौन, कर्म कितने शेष हैं, इनका विवरण इस प्रकार है-

क्रमांक  पद का नाम गुण देव / गुरू शेष कर्म
1 नमो अरिहंताणं 12 देव 4
2 नमो सिद्धाणं 8 देव 0
3 नमो आयरियाणं 36 गुरू 8
4 नमो उवज्झायाणं 25 गुरू 8
5 नमो लोएसव्वसाहूणं 27 गुरू 8
कुल 108
पाँच पद में से नींद किसे आती है और किसे नहीं आती ? शरीर सहित और शरीर रहित कौन हैं ? आहार कौन करते हैं और कौन नहीं करते हैं ? कौन बोलते हैं और कौन नहीं बोलते हैं ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)

 

क्रमांक पद का नाम नींद शरीर आहार बोलते/नहीं बोलते
1 अरिहंत भगवान नहीं आती हैं हैं करते हैं बोलते हैं
2 सिद्ध भगवान  नहीं आती हैं नहीं हैं नहीं करते हैं नहीं बोलते हैं
3 आचार्य जी आती हैं हैं करते हैं बोलते हैं
4 उपाध्याय जी आती हैं हैं करते हैं बोलते हैं
5 साधु-साध्वी जी आती हैं हैं करते हैं बोलते हैं
श्रावक किसे कहते हैं ? (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
जो केवली प्ररूपित धर्म का श्रवण करते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार आगार धर्म का पालन करते हैं उन्हें “श्रावक” कहते हैं । श्रद्धापूर्वक, विनय-विवेक पूर्वक जो क्रिया करता है वह श्रावक कहलाता है ।
अपेक्षित प्रश्न (पाठ -1 नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर)
1. अरिहंत के कितने कर्म शेष हैं ?
2. पंचपरमेष्ठी में से स्थानक में कितने है ? व्याख्यान कौन देता है ?
3. पंचपरमेष्ठी में से स्वप्न कौन देखते हैं ?
4. तीर्थ की स्थापना कौन करते हैं ?
5. पंचपरमेष्ठी में से केवलज्ञानी कितने हैं ?
6. जैन आगम कितने हैं ?
7. पाँच पद में से कितने हँसते लैं और कितने रोते हैं ?
गुरूवंदन, प्रदक्षिणा की विधि कौन-सा पाठ बताता है? (पाठ -2 तिक्खुत्तो - गुरूवंदन सूत्र)
‘दूसरा’ तिक्खुत्तो का पाठ गुरू वंदना और प्रदक्षिणा की विधि का है ।
गुरू वंदन की विधि क्या है ? (पाठ -2 तिक्खुत्तो - गुरूवंदन सूत्र)
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1. स्थिर खड़े होकर दोनों हाथों को जोड़कर दाँये कान से शुरू करके फिर से दाँये कान तक ले जाना । इसी प्रकार 3 आवर्तन (प्रदक्षिणा) करके
2. घुटनों पर बैठकर वंदामि नमंसामि शब्द बोलकर झुकना
3. फिर मस्तक ऊपर उठाकर आगे का संपूर्ण पाठ बोलना
4. “पज्जुवासामि” बोलते वक्त मस्तक को जमीन पर लगाना । इस तरह मस्तक, दो हाथ, दो पैर (कुल पाँच अंग) को झुकाकर तीन बार तिक्खुत्तो के पाठ से वंदना करनी चाहिये ।
देव और गुरू को कितनी बार वंदना की जाती है ? क्यों ?(पाठ -2 तिक्खुत्तो - गुरूवंदन सूत्र)
पंचपरमेष्ठी के
1 सम्यग् ज्ञान
2. सम्यग् दर्शन
3. सम्यग् चारित्र, इन तीन गुणों को वंदन-विनय करने के लिए वंदना की जाती है । वंदना करते समय ऐसा चिंतन किया जाता है कि अपने में भी वे गुण उत्पन्न हों, इसलिए गुरूवंदन तीन बार किया जाता है ।
गुरू वंदन के प्रकार कौन कौन से है ?(पाठ -2 तिक्खुत्तो - गुरूवंदन सूत्र)
गुरू वंदना के तीन प्रकार है । 1. जघन्य वंदना – रास्ते में चलते समय पूज्य साधु-साध्वी जी मिल जायें तब दोनों हाथों को जोड़कर, सिर झुकाकर ‘मत्थएण वंदामि’ बोलकर नमस्कार करना ।

2. मध्यम वंदना – पंचांग (दो हाथ, दो पैर, मस्तक) झुकाकर तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वंदना करना ।

3. उत्कृष्ट वंदना – प्रतिक्रमण का तीसरा पाठ बोलते हुए उत्कुटुक आसन में बैठकर, दो बार वंदना की जाती है ।

'सत्कार' का अर्थ क्या है ?(पाठ -2 तिक्खुत्तो - गुरूवंदन सूत्र)
गुरू भगवंतो का वाणी से सत्कार करना । “आइए, पाधारिए” बोलना । दोनों हाथों को जोड़कर वंदना करना सत्कार है ।
'सम्मान' का अर्थ क्या है ?(पाठ -2 तिक्खुत्तो - गुरूवंदन सूत्र)
गुरू भगवंत का सम्मान करना । योग्य आसन देना । वस्त्र, पात्र, गोचरी, पानी आदि बोहराना ।
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वंदना करने से क्या क्या लाभ होतें है ?(पाठ -2 तिक्खुत्तो - गुरूवंदन सूत्र)
शुद्ध भाव से विधि सहित वंदना करने से
1. नीच गोत्र (अशुभ कर्म) का क्षय (नाश) होता है ।
2. उच्च गोत्र (शुभ कर्म) का बंध होता है ।
3. सौभाग्य और सुख की प्राप्ति होती है ।
4. गुरू के प्रति अपना आदर भाव प्रगट होने से उनके वचन और आज्ञा का पालन सहजता से होता है ।
5. विनय गुण की प्राप्ति होती है ।
6. आदेय नाम कर्म का बंध होता है ।

शुद्ध भावना से वंदन करने का फल किसको मिला ?(पाठ -2 तिक्खुत्तो - गुरूवंदन सूत्र)
शुद्ध भावना से वंदन करने का फल श्री कृष्ण महाराज (वासुदेव) को मिला ।
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वंदना करने के बाद क्या करें ?(पाठ -2 तिक्खुत्तो - गुरूवंदन सूत्र)
1. भगवान को वंदना करने के बाद, भगवान की भक्ति करो ।
2. गुरूजी को वंदना करके गुरू आज्ञा को दिल में धारण करो ।
3. पिताजी को वंदना करके पिता के उपकार को याद करो ।
4. माताजी को वंदना करके माता के उपकार को याद करो ।
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अपेक्षित प्रश्न (पाठ -2 तिक्खुत्तो - गुरूवंदन सूत्र)
1. वंदना करते समय तिक्खुत्तो का पाठ कितनी बार बोलना चाहिए ?
2. गुरू के गुणगान के कितने शब्द हैं ? कौन-कौन से है ?
3. गुरू को कैसा-कैसा कहा गया है ?
4. पाँच अंग कौन-कौन से है ?
5. प्रदक्षिणा का अर्थ क्या है ?

सामान्य ज्ञान विभाग

24 तीर्थंकरों के नाम
1. श्री ऋषभदेव स्वामी 2. श्री अजितनाथ स्वामी 3. श्री संभवनाथ स्वामी
4. श्री अभिनन्दन स्वामी 5. श्री सुमतिनाथ स्वामी 6. श्री पद्मप्रभ स्वामी
7. श्री सुपार्श्वनाथ स्वामी 8. श्री चन्द्रप्रभ स्वामी 9. श्री सुविधिनाथ स्वामी
10. श्री शीतलनाथ स्वामी 11. श्री श्रेयांसनाथ स्वामी 12. श्री वासुपूज्य स्वामी
13. श्री विमलनाथ स्वामी 14. श्री अनन्तनाथ स्वामी 15. श्री धर्मनाथ स्वामी
16. श्री शांतिनाथ स्वामी 17. श्री कुंथुनाथ स्वामी 18. श्री अरनाथ स्वामी
19. श्री मल्लिनाथ स्वामी 20. श्री मुनिसुव्रत स्वामी 21. श्री नमिनाथ स्वामी
22. श्री नेमनाथ स्वामी 23. श्री पार्श्वनाथ स्वामी 24. श्री महावीर स्वामी
श्री महावीर स्वामी के 11 गणधरों के नाम
1. इन्द्रभूति 2. अग्निभूति 3. वायुभूति 4. व्यक्तजी 5. सुधर्मा स्वामी 6. मौर्यपुत्र
7. अकंपित 8. मंडित 9. अचलभ्राता 10. मेतार्य 11. प्रभास
श्री महावीर स्वामी के 10 श्रावकों के नाम
1. आनंद श्रावक 2. कामदेव श्रावक 3. चुलनीपिता श्रावक 4. सुरादेव श्रावक 5. चुलनीशतक श्रावक
6. कुंडकौलिक श्रावक 7. शकडालपुत्र श्रावक 8. महाशतक श्रावक 9. नंदिनीपिता श्रावक 10. सालिहीपिता श्रावक
सोलह सतियाँ के नाम
1. ब्राह्मी 2. सुन्दरी 3. चन्दनबाला 4. राजीमति
5. द्रौपदी 6. कौशल्या 7. मृगावती 8. सुलसा
9. सीता 10. दमयंती 11. शिवादेवी 12. कुंती
13. सुभद्रा 14. पुष्पचूला 15. प्रभावती 16. पद्मावती
छह काय के गोत्र के नाम
1. पृथ्वीकाय (मिट्टी) 2. अप्-काय (पानी) 3. तेउकाय (अग्नि)
6. वायुकाय (हवा) 9. वनस्पतिकाय (पौधे, पत्ते) 10. त्रसकाय (चलने-फिरनेवाले जीव)
आठ कर्म के नाम
1. ज्ञानावरणीय कर्म 2. दर्शनावरणीय कर्म 3. वेदनीय कर्म 4. मोहनीय कर्म
5. आयुष्य  कर्म 6. नाम  कर्म 7. गोत्र  कर्म 8. अंतराय कर्म
नव तत्त्वों के नाम
1. जीव तत्त्व (Living Being) 2. अजीव तत्त्व (Non-Living Being) 3. पुण्य तत्त्व (सुख)
4. पाप  तत्त्व (दुःख) 5. आश्रव तत्त्व (कर्म की आवक) 6. संवर तत्त्व (कर्म रोकना)
7. निर्जरा  तत्त्व (कर्म क्षय करना) 8. बंध तत्त्व (कर्म जोड़ना) 9. मोक्ष तत्त्व (कर्म से मुक्त)
तीन तत्त्वों के नाम
1. देव तत्त्व – अरिहंत देव 2. गुरू तत्त्व – निर्ग्रंथ गुरू 3. धर्म तत्त्व – केवली प्ररूपित धर्म

संस्कार विभाग

दोहा

विनय से विद्या दीपे, विनय धर्म का अंग ।
प्रीति भी उससे बढे़, करो विनय का संग ।।

आम का वृक्ष (पेड़) हमें क्या सिखाता है ? (पाठ -1, विनय धर्म-संस्कार विभाग)
जैसे-जैसे आम का वृक्ष बड़ा होता जाता है वैसे-वैसे वह नीचे झुकता जाता है । उसी तरह हमें भी नम्र बनना चाहिए । जो सच्चे ह्रदय के भाव से नमता (झुकता) है, वही सबके मन को भाता है।
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बड़प्पन कितने प्रकार के है ? कौन कौन से है ?(पाठ -1, विनय धर्म-संस्कार विभाग)
बड़प्पन दो प्रकार के है

1. उम्रका और
2. गुणका 

 
गुण से कैसे बड़े हो सकते है ?(पाठ -1, विनय धर्म-संस्कार विभाग)
समय (वक्त) सबको उम्र से बडा़ बनाता है, लेकिन गुणीजनों को नमन करने से गुण से बडे़ होते है । गुणीजनों को नमन करने से उनके गुण और धर्म के संस्कार हम में आते हैं ।
‘धर्म’ का क्या अर्थ है ? (पाठ -1, विनय धर्म-संस्कार विभाग)
1. जिसका विचार करने से, आचरण करने से, जिसकी शरण लेने से दुर्गति में न जाना पडे़ उसे धर्म कहते है ।

2. जीव को दुर्गति में जाने से रोके और आत्मगुणों को प्रगट करे, वह धर्म है ।

3. धर्म का अर्थ भलाई करना और बुराई छोड़ना ।

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धर्म का मूल क्या है ? (पाठ -1, विनय धर्म-संस्कार विभाग)
धर्म का मूल विनय है ।
‘विनय’ का अर्थ क्या है ? (पाठ -1, विनय धर्म-संस्कार विभाग)
विनय का अर्थ नम्र बनना/सीखना/झुकना है ।
विनय धर्म की प्राप्ति कैसे होती है ? (पाठ -1, विनय धर्म-संस्कार विभाग)
विनय धर्म की प्राप्ति के लिए

1. बड़ों और गुणवानों को मान देना चाहिए।
2. उनके सामने नही बोलना चाहिए।
3. देव-अरिहंत, गुरू, साधु, साध्वीजी और अहिंसा प्रधान धर्म को नित्य वंदन करना चाहिए।

4. उनका बहुमान करना चाहिए ।

5. उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए ।

विनय से क्या फायदा (लाभ) होता है ? (पाठ -1, विनय धर्म-संस्कार विभाग)
विनय से लाभ

1. तीर्थंकर भगवान की आज्ञा का पालन होता है।
2. अभिमान चला जाता है।
3. अच्छे विचार आते है।
4. वाणी में मिठास आती है।
5. ह्रदय विशाल और दयालु बनता है।
6. दुश्मन भी मित्र बन जाते है।
7. विद्या, त्याग, वैराग्य और विवेक जैसे गुणों से जीवन सुरभित होता है । इस तरह विनय से आत्मा का विकास होता है और हम सुखी बनते है ।

पाठ-2, माता-पिता को भूलना नहीं (संस्कार विभाग)
1. मुझ पर सबसे ज्यादा उपकार मेरे माता-पिता का है, जिसे मैं कभी भी नहीं भूलूँगा ।
2. माता-पिता ने मुझे जन्म दिया, मेरे जीवन में धार्मिक सुसंस्कारों का सिंचन किया है । मैं उनका ऋण चुका नहीं सकता ।
3. मैं हमेशा आनंद में और सुखी रहूँ इसलिए मेरी इच्छाएँ पूर्ण करने के लिए उन्होंने सदा प्रयत्न किये हैं ।
4. मैं प्रतिदिन सुबह उठकर माता-पिता को “जय जिनेन्द्र” बोलूँगा । उनके प्रति विनय, आदर, बहुमान के भाव रखकर हमेंशा उनकी भावना के अनुसार जीवन बनाने का प्रयत्न करूँगा ।
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5. मैं उनके सामने नहीं बोलूँगा । उनके दिल को चोट लगे, वैसा व्यवहार नहीं करूँगा । कभी भी जिद नही करूँगा ।
6. बुरे मित्रों से दोस्ती नहीं करूँगा और बुरे व्यसनों में खर्च नहीं करूँगा ।
7. उनके बुढ़ापे में और बीमारी में उनकी सेवा करूँगा । पूरी जिंदगी उनकी सेवा करने पर भी उनके उपकार को मैं चुका नहीं सकूँगा । उन्हें धर्म करने के लिए सब सुविधाएँ दूँगा । उनकी सद्-गति हो वैसा प्रयत्न करूँगा ।

सहन करना

क्या करना ? क्या नही करना ?
माता-पिता की डाँट सहन करना । माता-पिता के विरूद्ध नहीं जाना ।
शिक्षक का दण्ड सहन करना । शिक्षक के विरूद्ध नहीं जाना ।
किसी की भी गालियाँ सहन करना । गालियों के बदले गालियाँ नहीं देना ।
दुःख सहन करना । आपने दुःख के गीत नहीं गाना ।

सहन करने मे सौ गुण ।

पाठ-3, विवेक (संस्कार विभाग)

विवेक

विनय करने से विवेक का गुण आता है । स्वयं की आत्मा का और जीवन का हित कहाँ है और कहाँ नहीं है ? यह सोच कर अच्छा व्यवहार करना, उसे विवेक कहते हैं ।
जो अविवेकी है, वह सोया हुआ है । जो विवेकवान है, वह जागृत हैं ।

1. विवेक कीमती धनभंडार है
2. विवेक से धर्म की शोभा बढ़ती है
3. विवेक से सबके प्रिय बनते है
4. विवेक से महापुरूष बन सकते है ।
इसलिए मै आहार विवेक, वाणी विवेक और दृष्टि विवेक रखूँगा ।

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पाठ-3, आहार विवेक (संस्कार विभाग)

आहार विवेक

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मै भोजन करते समय नीचे बताई गई बातों का ध्यान रखूँगा, यह मेरा आहार विवेक है-
1. भोजन करने से पहले पाँच बार नवकार सूत्र स्मरण करके सुपात्रदान की भावना भाऊँगा ।
2. मेरे लिए भोजन की अलग अलग चीजें बनानी पडे़, मन पसंद या स्वादिष्ट खाना बनाना पडे़, इसके लिए मैं जिद नहीं करूँगा । बार बार नहीं खाऊँगा ।
3. भोजन में स्वाद के लिए ऊपर से कच्चा नमक आदि सचित वस्तु का उपयोग नहीं करूँगा ।
4. भोजन करते समय या बाद में आहार की प्रशंसा या निंदा नहीं करूंगा । मौन रखूँगा । भोजन के बाद थाली पानी से धोकर पीऊँगा ।
5. बिना कारण पैसे खर्च करके होटल या ठेले की खुली चीजें (वस्तुएँ) नही खाऊँगा ।
6. अष्टमी-पक्खी के दिन हरी सब्जी-तरकारी का त्याग करूँगा और उस दिन नवकारसी आदि छोटा तप तो जरूर करूँगा ।
7. हर रोज भूख से थोडा़ कम खाने की आदत डालूँगा ।
8. सूर्यास्त के बाद रात्रि भोजन का त्याग करूँगा, जिससे 1. तीर्थंकर की आज्ञा का पालन होता है 2. पूज्य संतों को बहराने का लाभ मिलता है 3. छह काय जीवों की दया होती है । इस तरह तीन लाभ होते है ।
पाठ-3, वाणी विवेक (संस्कार विभाग)

वाणी विवेक

स्वयं के या दूसरे के लिए हितकारी-प्रियकारी वाणी बोलना उसे ‘वाणी का विवेक’ कहते है । किसी को दुःख हो, ऐसी वाणी बोलना उसे ‘वाणी का अविवेक’ कहते हैं ।
1. मैं असत्य भाषा/झूठ नहीं बोलूँगा, किसी भी चीज के लिए झगडा़ नहीं करूँगा ।
2. मैं किसी को डर लगे, किसी के साथ झगड़ा हो, ऐसे कड़वे और खराब शब्दों का प्रयोग नहीं करूँगा ।
3. मैं ऊँची आवाज से नहीं बोलूँगा, माता-पिता और बड़ों के सामने अविनय से नहीं बोलूँगा ।
4. मैं हमेशा मीठी और नम्र वाणी बोलूँगा । दुःखी लोगों को आश्वासन मिले, वैसे शब्द बोलूँगा ।
5. धर्म से गिरते हुए जीवों को मेरी वाणी से स्थिरता मिले, वैसा बोलूँगा ।

पाठ-3, दृष्टी विवेक (संस्कार विभाग)

दृष्टि विवेक

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सिनेमा नहीं देखना चाहिये ।

सिनेमा देखने से होने वाले नुकसान-

  • आँखे खराब होती है ।
  • पैसा व्यर्थ जाता है ।
  • मन बिगड़ता है ।
  • जीवन बिगड़ता है ।
दुसरों के दोष नही देखने चाहिये ।

दूसरों के दोष देखने से नुकसान-

  • खुद में दोष आता है ।
  • खुद के गुण चले जाते है ।
बुरे कार्य नही देखने चाहिये ।

बुरे कार्य देखने से नुकसान-

  • बुरे काम होते है ।
  • बुरे भाव आते है ।
दूसरों का धन नहीं देखना चाहिये ।

दुसरों का धन देखने से नुकसान-

  • चोरी का मन होता है ।
  • धन का लोभ जागता है ।

इस तरह टी.वी., सिनेमा (पिक्चर) देखने में अमूल्य समय नष्ट नहीं करना ।
टेपरिकोर्डर सुनने में, कम्प्युटर गेम खोलने में समय नहीं बिगाड़ना ।

पाठ-3, अपेक्षित प्रश्न (संस्कार विभाग)

1. खाना खाने से पहले क्या करना  ?
2. रात्रि भोजन का त्याग करने से क्या लाभ होता है ?
3. क्या नहीं खाना ?
4. क्या नहीं देखना ?
5. सिनेमा देखने से क्या नुकसान होता है ?
6. दूसरों के दोष देखने से क्या नुकसान होता है ?
7. दूसरों का धन देखने से क्या नुकसान होता है ?

जैन पाठशाला का क्या अर्थ है ? (पाठ-4, जैन पाठशाला ,संस्कार विभाग)

जहाँ जैन धर्म का ज्ञान सिखाया जाता है, उसे जैन पाठशाला कहते है ।

धर्म का ज्ञान पाने से क्या लाभ होता है ? (पाठ-4, जैन पाठशाला ,संस्कार विभाग)

धर्म का ज्ञान पाने से
1. आत्मज्ञान होता है
2. हम करणीय(क्या करना ?) और अकरणीय (क्या नहीं करना ?) को जान सकते है
3. प्रामाणिकता, सादगी, संतोष, दयाभाव आदि गुणों की वृद्धि होती है ।

जैन पाठशाला में प्रतिदिन जाने से क्या लाभ होते है ? (पाठ-4, जैन पाठशाला ,संस्कार विभाग)
1. सच्चे देव-गुरू और धर्म की पहचान होती है
2. धार्मिक संस्कार मिलते है
3. विनय, विवेक, शिष्टाचार और नम्रता सीखने को मिलती है
4. जीव-अजीव की जानकारी मिलने से सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव उत्पन्न होता है
5. माता-पिता और बड़ों के उपकार की जानकारी होती है
6. सम्यग् ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप के आचरण द्वारा मोक्ष प्राप्त करने का उपाय जान सकते है
7. धर्म का ज्ञान मिलने से भविष्य में आदर्श नागरिक, श्रावक, श्राविका, साधु, साध्वी बन सकते है ।
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जैन पाठशाला में जाकर सर्व प्रथम क्या करना चाहिए ? (पाठ-4, जैन पाठशाला ,संस्कार विभाग)

जैन पाठशाला में जाकर सर्वप्रथम वंदना करके संवर या सामायिक करनी चाहिये ।
संवर के पच्चक्खाण-
द्रव्य से - 18 पाप और पाँच आश्रव सेवन के पच्चक्खाण
क्षेत्र से - जैन पाठशाला (घर, फ्लैट, ट्रेन) और बाहर दृष्टि जाती हो वहाँ तक आगार (नहीं तो खुद की जरूरत के अनुसार आगार करना) उसके सिवा 14 राजुलोक के आश्रव के पच्चक्खाण)
काल से - 1 बार नमस्कार सूत्र (नमो अरिहंताणं) गिनकर जब तक पारणा न करूँ तब तक
भाव से - उपयोग सहित पच्चक्खाण का पालन करना । एगविहं तिविहेणं न करेमि मणसा, वयसा, कायसा तस्स भंते, पडिक्कमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि ।
संवर पारने की विधि - मेरा संवर पूरा हुआ है, उसमें कोई दोष लगा हो तो “तस्स मिच्छामि दुक्कडं” बोलकर 3 नमस्कार सूत्र का काउसग्ग करना ।

सामायिक का अर्थ क्या है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)

1 अठारह पाप की वृत्ति (ईच्छा) और प्रवृत्ति छोड़कर समभाव प्राप्त करना सामायिक है ।
2. दो घडी़ (48 मिनट) तक शांति से एक स्थान पर बैठकर भगवान का और स्वयं के आत्म-गुणों का चिंतन करना ।
3. वे गुण स्वयं में प्रकाशित करने का प्रयास करना ।

सामायिक के उपकरण कौन-कौन से है ?? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)

सामायिक की आराधना के लिए

1. आसन
2. मुँहपत्ति
3. पूंजनी
4. रजोहरण
5. माला
6. पुस्तक
7. ठवणी
8. खेस
9 चोलपट्टा
10. आनुपूर्वी
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आदि उपकरण का उपयोग करना चाहिए । इनकी संक्षिप्त जानकारी नीचे दी गई है ।

आसन किससे कहते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)

1. सफेद वस्त्रों का (खादी का, ऊन का) छोटा टुकड़ा आसन कहलाता है ।
2. आसन को जमीन पर बिछाना है ।
3. आसन पर बैठकर सामायिक की जाती है ।

आसन क्यों बिछाते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)

आसन बिछाने से जीव जंतु इत्यादी अपने शरीर पर नहीं चढ़ते और पास में से चले जाते है ।

मुँहपत्ति किसे कहते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
मुँहपत्ति अर्थात् मुखवस्त्रिका । सफेद रंग का आठ पड का सूती कपडा़ (Cotton Clothes) मुँह पर रखकर कानों तक धागे से बाँधना है ।
मुँहपत्ति लगाने से क्या-क्या लाभ होते है अर्थात मुँहपत्ति लगाने से कौन-कौन से दोष से बच पाते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
1. वायुकाय के जीवों की रक्षा होती है ।
2. त्रसजीव मुँह में नहीं गिरते ।
3. जैन धर्म का चिन्ह है ।
4. इसे लगाकर बोलने से विवेक रहता है ।
पूंजनी किसे कहते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
1. यह ऊन का बना हुआ रहता है
2. इसे पकड़ने के लिए छोटी लकडी़ की डंडी (भाइयों के पूंजनी में) अथवा नाकी (बहनों के पूंजनी में) रहती है ।
3. चींटी, मकोड़े, कुंथुआ जैसे छोटे जीव जंतु आसन से शरीर पर चढ़ जाएँ तो पूंजनी से यतनापूर्वक (विवेक से) दूर किये जाते हैं ।
4. पूंजनी से उन जीवों को पीडा़, कष्ट या दुःख नहीं होता है ।
रजोहरण किससे कहते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
1. ऊन से बना हुआ और पूंजनी से बडा़ होता है
2. बडी़ लकडी़ से इसे बाँधा जाता है
3. रात्रि या अँधेरे में जमीन पर रहे हुए जीवों की रक्षा करने, दया पालने, पूँजकर चलने के काम आता है
4. पूंजनी और रजोहरण का उपयोग करने से जीव हिंसा से बच सकते है ।
माला किससे कहते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
माला में 108 मणके होते है । मणके को गिनकर 1 नवकार बोलना फिर 1 मणके को फिराना, ऐसे 108 नवकार बोलकर 1 माला गिनना ।
माला क्यों गिननी चाहिये ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
माला गिनने से मन की शांति मिलती है और कर्म निर्जरा होती है ।
धार्मिक पुस्तक किससे कहते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
जो पुस्तक पढ़ने से समभाव की वृद्धि हो । आत्मज्ञान-धार्मिक ज्ञान की जानकारी में वृद्धि हो, ऐसी धार्मिक पुस्तकों का सामायिक में पठन करना चाहिए ।
ठवणी किससे कहते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
1. यह पुस्तक रखने के लिए योग्य साधन है
2. इससे पुस्तक को अच्छी स्थिति में  रख सकते है
3. पढ़ने में सुविधा रहती है
4. प्रायःलकडी़ की बनी हुई होती है ।
खेस तथा चोलपट्टा किससे कहते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
सामायिक में पुरूष कमीज की जगह सफेद दुपट्टा पहनते है और पेन्ट की जगह सफेद चोलपट्टा पहनते है । बहनों को भी सादा और सफेद वस्त्र पहनना चाहिए ।
आनुपूर्वी किससे कहते है ? (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
जिसमें 1,4,3,2,5 ऐसे आडे़ और खडे़ रूप में अंक लिखे रहते है, जिससे ध्यान दूसरी और जाता नही । जहाँ 1 का अंक हो वहाँ नमस्कार सूत्र का प्रथम पद नमो अरिहंताण, 2 का अंक हो वहाँ नमो सिद्धाणं,3 का अंक हो वहाँ नमो आयरियाणं, 4 का अंक हो वहाँ नमो उवज्झायाणं तथा, 5 का अंक हो वहाँ नमो लोए सव्वसाहूणं पद ध्यान से चित्त की एकाग्रता के साथ बोलना है । ( यहाँ आनुपूर्वी के 20 खानों में से सिर्फ 1 खाना जानकारी के लिए दिया गया है ।)
1 2 3 4 5
2 1 3 4 5
3 1 2 4 5
2 3 1 4 5
3 2 1 4 5
विशेष जानकारी (पाठ-5, सामायिक के उपकरण ,संस्कार विभाग)
1. आसनः लगभग 2 फुट x 2 फुट का होता है ।
2. मुँहपत्तिः खुद के हाथ के 16 अंगुल x 21 अंगुल की होती है ।
3. खेसः सवा दो मीटर x 36 इंच का और दोनों पल्लू खुल्ला रहता है ।
4. चोलपट्टाः 2 या ढाई मीटर x 36 इंच का और दोनों बाजू परस्पर सिलाई करके जोडे़ हुए रहते है ।

मैं कौन हूँ ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)

मैं आत्मा हूँ ।

मेरा भला करने वाला कौन है ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)

मैं खुद ही हूँ ।

मेरा बुरा करने वाला कौन है ?(पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
मैं खुद ही हूँ ।

शूरवीर कौन है ?(पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
जो मन को जीतता है, वह शूरवीर है।

मन को कैसे जीता जा सकता है ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
ज्ञानाभ्यास करके जानकारी पाने से ।

होशियार कौन है ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
जो समय को पहचानता है।

मूर्ख कौन है ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
जो अमूल्य मानव भव को खो देता है ।

संसार का दास कौन ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
जो आशा का दास होता है, वह ।

संसार का मालिक कौन ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
आशा जिसकी दास है, वह ।

उत्तम दान कौन कौन से है ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
अभयदान, ज्ञानदान, सुपात्रदान और उचित्तदान ।

अमीर कौन ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
संतोषी ।

दरिद्र (गरीब) कौन ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
तृष्णावान (इच्छासहित जो है)

अभी किसका शासन चल रहा है ?(पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का शासन चल रहा है ।

‘जय जिनेन्द्र’ का अर्थ क्या है ? (पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)
‘जय जिनेन्द्र’ का अर्थ अनंत जिनेश्वर भगवंतों की जय हो ।

‘जय जिनेन्द्र’ बोलने से क्या लाभ होता है ?

(पाठ-6, ज्ञान चर्चा, संस्कार विभाग)

1 अनंत जिनेश्वर भगवंतो की जय होती है ।
2. जैन धर्म का गौरव बढ़ता है ।
3. जैनत्व की स्मृति होती है ।
4. जय जिनेन्द्र ये जैनत्व का सूचक शब्द है ।

कथा विभाग

कथा-1, भगवान महावीर (कथा विभाग)

भगवान महावीर स्वामी का जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (13) की मध्यरात्री को माता त्रिशलारानी की कुक्षि से हुआ था।

कथा-2, अमरकुमार (कथा विभाग)

मगधदेश के राजा श्रेणिक चित्रशाला बनवा रहे थे परन्तु उसका दरवाजा पूरा बनने से पहेले ही टूट जाता था ।

कथा-3, अतिमुक्त कुमार (कथा विभाग)

पोलासपुर नगर के राजा विजयसेन की रानी श्रीदेवी की कुक्षि से अतिमुक्त कुमार का जन्म हुआ ।

काव्य विभाग

काव्य 1 महावीर की संतान

महावीर की संतान हैं, भाई महावीर की संतान ।।धृ।।

काव्य 2 छोटे-छोटे बच्चे

छोटे छोटे बच्चे, मानो गुलाब के फुल ।

 

काव्य 3 सकल मंगल

सकल मंगल महामंगल, प्रथम मंगल कहूं जिनको।