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सूत्र विभाग

सामायिक के तीसरे पाठ का क्या नाम है ? (पाठ -3 इरियावहियं सूत्र-सूत्र विभाग)

इरियावहियं सूत्र अथवा आलोचना सूत्र ।

इस पाठ को 'आलोचना सूत्र' क्यों कहते है ? (पाठ -3 इरियावहियं सूत्र-सूत्र विभाग)

रास्ते में आते-जाते छह काय के जीवों की विराधना होती है । उसके पाप की माफी इस पाठ में माँगी जाती है । इसलिए इसे आलोचना सूत्र भी कहा जाता है ।

यह पाठ हमे क्या सिखाता है ? (पाठ -3 इरियावहियं सूत्र-सूत्र विभाग)
यह पाठ नीचे देखकर चलना, जीवों की दया पालना सिखाता है ।
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विराधना किसे कहते है ? (पाठ -3 इरियावहियं सूत्र-सूत्र विभाग)

विराधना मतलब जीवों की हिंसा ।

विराधना कौन-कौन से जीवों की हो सकती है ? (पाठ -3 इरियावहियं सूत्र-सूत्र विभाग)

एकेन्द्रिय, बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौरेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय, इस तरह पाँच प्रकार के जीवों की विराधना हो सकती है  ।

विराधना के प्रकार कितने और कौन-कौन से है ? (पाठ -3 इरियावहियं सूत्र-सूत्र विभाग)

विराधना के 10 प्रकार है । “अभिहया……से……जीवियाओ ववरोविया” तक इन दस प्रकार की क्रियाओं द्वारा विराधना होती है ।

विराधना से किस तरह बच सकते है ? (पाठ -3 इरियावहियं सूत्र-सूत्र विभाग)

किसी भी कार्य में जीवहिंसा न हो या कम से कम हो, ऐसा सोच कर यतनापूर्वक (घ्यान से) कार्य करने से जीवों की विराधना से बचा जा सकता है । फिर भी विराधना हो जाए तो पाप से बचने के लिए इरियावहिया की जाती है ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ -3 इरियावहियं सूत्र-सूत्र विभाग)

1. एकेन्द्रिय, बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौरेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय – ये क्या है ?
2. आपको आँख चाहिए या कान  ? और क्यों  ?
3. मक्खी की कितनी इन्द्रियाँ होती है  ? और कौन-कौन सी ?
4. आपकी कितनी इन्द्रियाँ है  ?
5. जिसको नाक न हो उसे कितनी इन्द्रिया वाला कहा जाता है ?

विशेष ज्ञान (पाठ -3 इरियावहियं सूत्र-सूत्र विभाग)

इरियावही कब करना ?
1. सामायिक लेने की शुरूआत में।
2. सामायिक पौषध आदि न्रत के वक्त लघुनीत या बड़ी नीत वगैरह परठने के बाद।
3. सामायिक-पौषध आदि व्रत के वक्त सोकर उठने के बाद।
4. सामायिक, देशावकाशिक आदि व्रत के वक्त गौचरी करके आने के बाद।
5. सामायिक-पौषध व्रत के दौरान कपडा़ उपधि आदि के प्रतिलेखन के बाद।
6. व्रत में एक जगह से दूसरी जगह जाएँ तब।
7. सामायिक व्रत लेकर 24 मिनिट होने के बाद, प्रतिक्रमण करने के वक्त।
8. संवत्सरी के दिन आलोचना सुनने से पहले क्षेत्र विशुद्धि के समय इरियावहिया का काउसग्ग किया जाता है ।

सामायिक का चौथा पाठ किस लिए है ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

सामायिक का चौथा पाठ आत्मा की विशेष शुद्धि करने के लिए और काउसग्ग के आगार जानने के लिए है ।

प्रायश्चित का अर्थ क्या है ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

जिससे पाप का नाश हो अथवा चित्त की और व्रत की विशुद्धि हो, उसे प्रायश्चित कहते है  ।

शल्य का अर्थ क्या है ? शल्य कितने है ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

शल्य का अर्थ है कांटा । जिससे पीडा़ (दुःख) हो । शल्य तीन है

1. माया
2. निदान
3. मिथ्यादर्शन ।

आगार का अर्थ क्या है ? काउसग्ग के आगार कितने और कौन कौन से है ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

आगार का अर्थ है छूट । काउसग्ग के आगार 12 है । वे इस पाठ के ‘ऊससिएणं…से…..सुहुमेहिं दिट्ठी संचालेहिं’ तक के शब्दों द्वारा बताया है ।

काउसग्ग का अर्थ क्या है ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

काउसग्ग का अर्थ है शरीर को स्थिर रखना और शरीर के प्रति राग का त्याग करना ।

अभग्गो का अर्थ क्या है ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

अभग्गो का अर्थ है आगारों का सेवन हो, फिर भी काउसग्ग नही टूटता ।

अविराहिओ का अर्थ क्या है ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

अविराहिओ का अर्थ है आगारों के सेवन से भगवान की आज्ञा की विराधना नहीं होती ।

काउसग्ग कौन सा शब्द बोलकर पाला जाता है ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

काउसग्ग नमो अरिहंताणं’ बोलकर पाला जाता है ।

पावाणं कम्माणं का अर्थ क्या है वो कितनें है ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

पावाणं का अर्थ पाप है, ये 18 है । कम्माणं का अर्थ कर्म है, ये 8 है ।

काउसग्ग कैसे किया जाता है और इसके क्या-क्या फल होते है ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)
काउसग्ग बैठकर अथवा खड़े रहकर दो हाथ नीचे रखकर, दोनों आँखे अधखुली रखकर, एक पदार्थके ऊपर दृष्टि स्थिर करके किया जाता है।
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काउसग्ग का फल
1. आत्मा पाप कर्म के बोझ से हल्की होती है ।
2. शुभ ध्यान वाली होती है।
3. सुख समाधि में रहती है।

काउसग्ग क्यों किया जाता है । ? (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

1. पाप का प्रायश्चित करने के लिए ।
2. आत्मा को विशेष शुद्ध करने के लिए ।
3. पाप कर्मों का नाश करने के लिए ।
4. शल्यों से रहित होने के लिए काउसग्ग किया जाता है ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ -4 उत्तरीकरण सूत्र-सूत्र विभाग)

1 यह पाठ किसका नाश करना बतलाता है ?
2. यह पाठ कब बोला जाता है ?
3. काउसग्ग की स्थिति कितनी ?

इस पाठ का दुसरा नाम क्या है ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

इस पाठ का दूसरा नाम चतुर्विंशति स्तव अथवा उत्कीर्तन सूत्र है ।

'चउवीसथव' स्तव किस लिए है ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

इसमें 24 तीर्थंकरों की स्तुति की गई है, इसलिए लोगस्स को चतुर्विंशति स्तव अर्थात चउवीसथव भी कहते है।

तीर्थंकर किसके ऊपर प्रसन्न होते है ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

तीर्थंकर रागद्वेष से रहित होने से किसी के भी ऊपर प्रसन्न नही होते है ।

'तित्थयरा मे पसीयंतु' ऐसी प्रार्थना क्यों की जाती है ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

तीर्थंकर जैसे गुण हम में प्रगट हो, उनका उपदेश अंगीकार करने की भावना दृढ़ बने और इससे हम मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकें, इसलिए ऐसी प्रार्थना की जाती है ।

'कित्तिय' का अर्थ ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

‘कित्तिय’ का अर्थ वाणी स्तुति करना ।

वंदिय का अर्थ ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

वंदिय का अर्थ है काया से पंचांग नमाकर नमस्कार करना ।

महिया का अर्थ ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

महिया का अर्थ है भाव से स्मरण करना ।

कीर्तन, वंदन और स्मरण से क्या लाभ होता है ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

कीर्तन वंदन और स्मरण से
1. ज्ञान बढ़ता है।
2. श्रद्धा बढ़ती है।
3 नये पाप कर्मों का बंध नहीं होता।
4 पुण्य का बंध होता है।
5. पुराने पाप कर्मों का नाश होता है ।

तीर्थंकर को किसकी उपमा दी गई है ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)
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तीर्थंकर को चंद्र, सूर्य और सागर इन तीनों की उपमा दी गई है ।
तीर्थंकर सूर्य से भी अधिक प्रकाश करने वाले क्यों कहे जाते है ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

सूर्य मर्यादित क्षेत्र को प्रकाशित करता है, परन्तु तीर्थंकर अपने केवलज्ञान से संपूर्ण द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव को प्रकाशित करते है, इसलिए तीर्थंकर सूर्य से भी अधिक प्रकाश करने वाले कहे जाते है ।

लोगस्स का पाठ शाश्वत (सदा रहनेवाला) है या अशाश्वत ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

लोगस्स का पाठ शाश्वत है, मात्र इस पाठ में बताये गये तीर्थंकरों के नाम बदलते है।

लोगस्स में कितने तीर्थंकरों के दो नाम बताये है ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

लोगस्स में एक तीर्थंकर के दो नाम बताये है । नववें तीर्थंकर श्री सुविधिनाथ स्वामी का दूसरा नाम पुष्पदंत प्रभु बताया गया है ।

लोगस्स द्वारा भगवान के पास क्या माँगा गया है ? (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

लोगस्स द्वारा भगवान के पास
अरूग्ग-आरोग्य. आत्मिक शांति
बोहिलाभं - बोधिलाभ, समकित
समाहिवर मुत्तमं - श्रेष्ठ समाधि भाव ये तीन चीजें माँगी गइ है ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ -5 लोगस्स सूत्र-सूत्र विभाग)

1 इस पाठ में नेमिनाथ भगवान के लिए क्या नाम दिया है ?
2 तीर्थंकर किसकी स्थापना करते है ?
3 क्या वर्तमान में तीर्थंकर हमारे पास मौजूद है ?
4 सामायिक के कौन से पाठ में तीर्थंकर की स्तुति होती है ?

सामायिक किसे कहते है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)
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18 पाप की वृत्ति और प्रवृत्ति छोड़कर समभाव प्राप्त करने को सामायिक कहते है ।

 

दो घडी़ शांति से एक स्थान पर बैठकर भगवान का और खुद की आत्मा के गुणों का चिंतन करना तथा भगवान के गुण स्वयं में प्रकट करने का प्रयास करना, इसे सामायिक कहते है ।

सामायिक में किसका त्याग किया जाता है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

सामायिक में सावद्ययोग का त्याग किया जाता है ।

सावद्य योग किसे कहते है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

18 पाप की प्रवृत्ति को सावद्ययोग कहते है ।

दो घडी़ (मुहूर्त) किसे कहते है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

एक घडी़ = 24 मिनिटदो घडी़ = 48 मिनिट = 1 मुहूर्त 

करण किसे कहते है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

करण अर्थात क्रिया का साधन अथवा हेतु, करण तीन है-करना, कराना और अनुमोदन ।

योग किसे कहते है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

योग अर्थात् मन, वचन और काया का व्यापार अथवा प्रवृत्ति ।

कोटि किसे कहते है वे कितने है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

कोटि अर्थात प्रकार, मर्यादा । करण और योग के गुणा करने से कोटि की संख्या प्राप्त होती है । जैसे कि 3 करण x 3 योग = 9 कोटि

सामायिक का समय कम से कम कितना है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

सामायिक का समय कम से कम दो घड़ी का है ।

सामायिक में कितनी घड़ी मिलाकर ज्यादा सामायिक कर सकते है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

सामायिक दो घड़ी की होती है, उसमें 2,4,6,8 आदि घडी़ मिला सकते है।

श्रावक कितनी कोटि से सामायिक का पच्चक्खाण लेते है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

श्रावक 6 और 8 कोटि से सामायिक के पच्चक्खाण लेते है ।

'निंदामी' और 'गरिहामि' में क्या अन्तर है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

‘निंदामि’ का अर्थ आत्मसाक्षी से दोषों की आलोचना । ‘गरिहामि’ का अर्थ गुरूसाक्षी से दोषों की आलोचना ।

सामायिक करने से क्या लाभ होता है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

1 सावद्य योगों का त्याग होता है।
2 समभाव की प्राप्ति होती है।
3 सभी जीवों को अभयदान मिलता है।
4 कर्म निर्जरा होती है, शुभ कर्म का बंध होता है।
5 अच्छी गति का आयुष्य बंधता है और अनुक्रम से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
6 दो घडी़ साधु जैसा जीवन जीया जाता है और धर्म का पठन-पाठन करने का अवसर प्राप्त होता है।

सामायिक में कैसी प्रवृत्ति नही करनी चाहिए ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

1 सामायिक में बहन-भाइयों को और भाई-बहनों को छूते नही।
2 किसी भी जीव को दुःख हो, वैसा नहीं करना चाहीए।
3 सामायिक के 32 दोष टालकर सामायिक करनी चाहिए।
4 सामायिक में खुल्ले मुँह नही बोलना चाहिए।
5 इलेक्ट्रीक साधनों के स्विच को छूना नहीं या उपयोग में नही लेना, चालू-बंद करने के लिए किसी को नहीं कहना चाहिए । इस तरह सामायिक में हिंसा आदि हो ऐसी कोइ भी प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिए ।

सामायिक में कैसी प्रवृत्ति करनी चाहिए ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

1 धार्मिक पुस्तकों का पठन-पाठन करना चाहिए।
2 नया अभ्यास कंठस्थ करना चाहिए।
3 व्याख्यान सुनना, प्रार्थना करनी, वांचनी सुननी, ध्यान धरना, काउसग्ग करना।
4 आत्म गुणों का और 12 भावनाओं का चिंतन करना चाहिए ।

सामायिक में साधु को गोचरी बोहरा सकते है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

जिसने सामायिक न की हो, उसकी आज्ञा लेकर गोचरी बोहरा सकते है।

सामायिक में साधु को गोचरी के घर दिखाने ले जा सकतें है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

हाथ में गुच्छा लेकर, नीचे देखकर, इर्यासमिति पूर्वक चलकर पू. साधु-साध्वीजी के साथ गोचरी के घर दिखाने जा सकते है । वापस आकर इरियावहिया का काउसग्ग करना चाहिए ।

जैन साधु की सामायिक को क्या कहते है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

जैन साधु की सामायिक को दीक्षा कहते है ।

सामायिक करने से पहले क्या स्नान करना जरूरी है ? (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

सामायिक या अन्य कोई भी धार्मिक क्रिया करने से पहले स्नान करना जरूरी नही, परन्तु आत्मशुद्धि जरूरी है ।

विशेष जानकारी (पाठ -6 करेमिभंते ! सूत्र-सूत्र विभाग)

1 प्रथम 3 वंदना तिख्खुत्तो तो का पाठ बोलकर करना।
2 बाद में सामायिक का छठ्ठा पाठ बोलना । उसमें काल से दो घडी़ उपरांत न पालूं तब तक के बदले काल से बीते काल को मिलाकर (2) घडी़ के पच्चक्खाण किये थे उसमें दो घडी़ और मिलाकर कुल चार घडी़ उरांत न पालूं तब तक पच्छक्खाण, ऐसा बोलना।
3 तीन नमोत्थणुं बोलकर 3 नवकार का काउसग्ग करना ।

इस पाठ के क्या-क्या नाम है ? (पाठ -7 नमत्थुणं सूत्र-सूत्र विभाग)

नमोत्थुणं के 2 नाम हैं -
1. शक्रस्तव
2. प्रणिपात सूत्र

शक्रस्तव और प्रणिपात सूत्र अर्थात् क्या ? (पाठ -7 नमत्थुणं सूत्र-सूत्र विभाग)

शक्रेन्द्र आदि इन्द्र जिनेश्वर देव की स्तुति करते है, तब यह पाठ बोलते है, इसलिए इसे शक्रस्तव कहते है ।

प्रणिपात सूत्र – अर्थात् विशेष नमस्कार ।

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लोगस्स और नमोत्थुणं मे क्या अन्तर है ? (पाठ -7 नमत्थुणं सूत्र-सूत्र विभाग)

लोगस्स में तीर्थंकरों की नाम स्तुति है, जबकि नमोत्थुणं में अरिहंत, सिद्ध की गुण स्तुति और गुण स्मरण है

(2) लोगस्स पद्यरूप (काव्य) है, जबकि नमोत्थुणं गद्यरूप (पाठ) है ।

पहला नमोत्थुणं सिद्धों को क्यों किया जाता है ? (पाठ -7 नमत्थुणं सूत्र-सूत्र विभाग)
पहला नमोत्थुणं सिद्धों को इसलिए किया जाता है क्योंकि अरिहंत से सिद्ध भगवान बड़े है । सिद्ध भगवान ने 8 कर्मक्षय किये है, जबकि अरिहंत भगवानने 4 घातिक्रम क्षय किये है और 4 अघातिकर्म क्षय करना शेष है ।
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इस पाठ में मोक्ष की विशेषता बताने वाले शब्द कौन-से है ? (पाठ -7 नमत्थुणं सूत्र-सूत्र विभाग)

सिव, मयल, मरूय, मणंत, मक्खय, माव्वाबाह और मपुणरावित्ति इन 7 शब्दों द्वारा मोक्ष की विशेषता बताई है ।

हमे तीर्थंकर भगवान क्या देते है ? (पाठ -7 नमत्थुणं सूत्र-सूत्र विभाग)

तीर्थंकर भगवान हमें आठ दान देते है

1 अभयदान
2 ज्ञानरूपी चक्षु
3 मोक्षमार्ग
4 सभी जीवों को शरण
5 संयमरूपी जीवन
6 बोधि / समकित
7 चरित्र धर्म
8 धर्म का उपदेश

(जब प्रश्न में पाठ के शब्द पूछे जैयें तो आभयदयाणं, चक्खु-दयाणं, मग्गदयाणं, जीवदयाणं, बोहिदयाणं, धम्मदयाणं और धम्मदेसयाणं ये 8 शब्द लिखें । )

अपेक्षित प्रश्न (पाठ -7 नमत्थुणं सूत्र-सूत्र विभाग)

1 नमोत्थुणं मे तीर्थंकर को कितनी और कौन कौन सी उपमाएँ दी गई है  ?
2 नमोत्थुणं में एकेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवों की उपमा बताने वाले शब्द कौन-कौन से है ?
3 सिद्ध की स्तुति किस पाठ से की जाती है ?

अतिचार का अठवाँ पाठ किस विषय का है ? किस बारे में है ? (पाठ -8 अतिचार निवृत्ति सूत्र-सूत्र विभाग)

सामायिक का आठवाँ पाठ जाने-अनजाने में लगे दोषों की आलोचना करका माफी माँगने के लिए है ।

पाप की सीढि़याँ कितनी और कौन-कौन सी है ? (पाठ -8 अतिचार निवृत्ति सूत्र-सूत्र विभाग)

पाप की चार सीढि़याँ है
अतिक्रम
व्यतिक्रम
अतिचार
आनाचार

अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार और अनाचार का अर्थ बताइए ? (पाठ -8 अतिचार निवृत्ति सूत्र-सूत्र विभाग)
अतिक्रम – लिए हुए व्रत को तोड़ने की इच्छा करना ।hjp1-39-1 copy
व्यतिक्रम – व्रत की मर्यादा तोड़ने की सामग्री इकठ्ठी करना ।hjp1-39-2 copy
अतिचार – व्रतभंग के लिए तैयार होना । व्रत को आंशिक या देशतः भंग करना ।hjp1-39-3 copy
अनाचार – व्रत की मर्यादा को तोड़कर सर्वथा व्रत भंग करना ।hjp1-39-4 copy
सामायिक के कितने अतिचार है ? (पाठ -8 अतिचार निवृत्ति सूत्र-सूत्र विभाग)

सामायिक के पाँच अतिचार है
1 मण दुप्पणिहाणे ।
2 वय दुप्पणिहाणे।
3 काय  दुप्पणिहाणे।
4 सामाइयस्स सई अकरणया।
5 सामाइयस्स अणवटि्ठयस्स करणया ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ -8 अतिचार निवृत्ति सूत्र-सूत्र विभाग)

1 सामायिक कहाँ करनी चाहिए ?
2 सामायिक में कैसा वेश पहनना चाहिए ?
3 सामायिक के उपकरण क्या-क्या है ?
4 शुद्ध सामायिक कैसे होती है ?
5 सामायिक में अंग मोड़ना या मल निकाल सकते है ?
6 सामायिक में कितनी और कौन-कौन सी संज्ञा से दूर रहना चाहिए ?
7 सामायिक में कौन-कौन सी विकथा नहीं कर सकते ?
8 सामायिक के कितने दोष है ?

तत्त्व संस्कार विभाग

पाठ -1,पूज्य साधु-साध्वीजी के साथ आदर्श व्यवहार (तत्त्व संस्कार विभाग)

 

1 पू. साधु-साध्वीजी के पास जब जाउँगा, तब अभिगम का पालन करूँगा ।
पू. साधु साध्वी जी के पास जाते समय अथवा जब वे रास्ते में मिलें, तब पालने योग्य नियम अभिगम कहलाते है । यह पाँच है-
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i.  सचित्त का त्याग – जिसमें जीव हो, उसे सचित्त कहते है । उदाहरणरूपः सचित्त पानी, सचित्त वनस्पति, मुँह में पान, सिर में फूल आदि का त्याग करके पू. साधु-साध्वीजी के पास जाना चाहिए ।
ii. अचित्त का विवेक - जीसमें जीव न हो, उसे अचित्त कहते है । उदाहरणरूपः छाता, लकडी़, चप्पल (जूता) आदि अचित्त दर्पसूचक वस्तुओं (मुकुट, छत्र, चंवर, गाडी़) का त्याग कर गुरू के पास जाना ।
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iii. अंजलिकरण- पू. साधु साध्वीजी के दर्शन होते ही दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुकाना । (मत्थएणं वंदामि) कहना ।
iv. उत्तरासंग - मुँह पर मुँहपत्ति बाँधनी या रूमाल रखना, खुले मुँह बोलना नहीं ।
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v. मन की एकाग्रता - मन की एकाग्रता से व्याख्यान, वाचनी सुनना और स्वाध्याय करना ।

2 मैं उनके दर्शन-वंदन करने नियमित प्रतिदिन जाऊँगा ।
उन्हें प्रतिदिन तिक्खुत्तो का पाठ बोलकर तीन वंदना करूँगा ।

3. प्रतिदिन खाना खाने से पहले मैं पू. साधु साध्वीजी को बहराने की भावना भाऊँगा ।

4. वे जब घर में गोचरी के लिए पधारेंगे तब “पधारिए, पाधारिए” कहकर सात-आठ कदम आगे जाऊँगा और उन्हें गोचरी के घर बताने जाऊँगा ।

5. उन्हें मेरे जीवन के केन्द्र में रखकर उनके प्रति आदर, बहुमान व भक्तिभाव रखूँगा ।
6. वे कर्मबंधन को तोड़ने का उपदेश देते है, वह प्रतिदिन सुनने जाऊँगा ।

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अपेक्षित प्रश्न पाठ -1,पूज्य साधु-साध्वीजी के साथ आदर्श व्यवहार (तत्त्व संस्कार विभाग)

1 अभिगम का अर्थ क्या है ?
2 पू. साधु साध्वीजी रास्ते में मिले तब तक क्या करना चाहिए ?
3 सचित्त का अर्थ क्या है ?
4 अचित्त का अर्थ क्या है ?
5 पू. साधु-साध्वीजी क्या उपदेश देते है ?
6 वंदना कैसे की जाती है  ?

पाठ -2,क्या सदैव नहीं रहता ? (तत्त्व संस्कार विभाग)
जो सदा न नही रहता ।
उस पर राग नही करना ।
उस पर द्वेष नही करना ।
उसके लिए पाप नही करना ।

क्या-क्या हमेशा स्थिर नही रहता
आरोग्य हमेशा नही रहता ।
रिश्ता हमेशा नही रहता ।
शरीर हमेशा नही रहता ।
वैभव हमेशा नही रहता ।
यौवन हमेशा नही रहता ।

सुख क्षणिक है । दुःख क्षणिक है ।
या सब पानी के बुलबुले के समान नाशवान है ।
ये सब संध्या की लालिमा के सामान नाशवान है ।
सुख में कभी फूलना नही । दुःख से डरना नही ।

अनित्य…क्षणिक….नाशवान चीजों को जानकर उन पर ममत्व (मेरापन) नही रखना ।

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अपेक्षित प्रश्न (पाठ -2,क्या सदैव नहीं रहता ?, तत्त्व संस्कार विभाग)

1 क्या-क्या हमेशा नही रहता  ?
2 सुख दुःख किसके जैसे नाशवान है ?
3 जो हमेशा रहनेवाला नही, उस पर क्या नही करना  ?

पाठ -3,कौन शरण देता है ? (तत्त्व संस्कार विभाग)

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दुःख से कौन बचाये ?
अशांति से कौन बचाये ?
जो खुद दुःखी हो, वह दूसरे को दुःख से बचा सकता है ?
जो खुद अशांत हो क्या वह दूसरे को शांति दे सकता है ?
नही, कभी नही।
यह दुनिया दुःख, रोग, क्लेश, अशांति से भरी हुई है ।
नाना प्रकार की चिंता और उपाधियों से भरी हुई है ।
दुनिया में अपनी आत्मा को कौन बचाएगा ?
कोई नही बचाएगा, कोई नही बचाएगा
शत्रुओं से सैनिक बचाते है न ?
रोगों से डॉक्टर बचाते है न ?
मुसीबतों में रिश्तेदार बचाते है न ?
हाँ..बचाते है, हमेशा के लिए नही ।
रक्षण करते है, लेकिन हमेशा के लिए नही ।
शत्रुओं से भी बहुत मरते है,
रोगों से भी बहुत मरते है ।
मुसीबतों से भी बहुत मरते है ।
मरने से कोई बचा सकता है ?….नही कोई नही बचा सकता ।
हर समय अरिहंत ही शरण देता है,
सिद्ध ही शरण देता है,
साधु ही शरण देता है,
धर्म ही शरण देता है ।

अपेक्षित प्रश्न पाठ -3,कौन शरण देता है ? (तत्त्व संस्कार विभाग)

1 ये दुनिया किससे भरी हुई है  ?
2 सच्ची शरण कौन देता है ?
3 दुनिया में आत्मा को कौन बचाता है ?

पाठ -4,मेरा कौन ? (तत्त्व संस्कार विभाग)

मैं इस दुनिया मे जन्मा हूँ,
मै दुनिया में जा रहा हूँ,
इसलिए मैं कहता हूँ कि…..
माता मेरी है, पिता मेरे है,
शरीर मेरा है, धन मेरा है ।
सब ऐसा कहते है, इसलिए मैं ऐसा कहता हूँ ।
मैंने सबको मेरा माना,
इसलिए…..मुझे राग होता है
अथवा द्वेष होता है…..
उनके लिए मैं पाप करता हूँ…..
इसलिए मैं कर्म बाँधता हूँ…..
लेकिन भगवान कहते है…..
दुनिया मे मारा कोई नही
मै दुनिया में किसी का नही…..
इसलिए…..मेरी आत्मा ही मेरी है और धर्म ही मेरा है ।

अपेक्षित प्रश्न पाठ -4,मेरा कौन ? (तत्त्व संस्कार विभाग)

1 मैं क्या कहता हूँ ?
2 सबको अपना मानने से क्या होता है ?
3 दुनिया में मेरा कौन है ?
4 दुनिया मे मेरा क्या नही ?

पाठ -5,हर रोझ सोचना..... (तत्त्व संस्कार विभाग)

नंदीषेण मुनि जैसी सेवा कब करूँगा ?
महावीर की तरह कष्ट कब सहन करूँगा ?
शालिभद्र जैसा त्याग कब करूँगा ?
धन्नाअणगार जैसा तप कब करूँगा ?
बालक अमरकुमार जैसा श्रद्धावान कब बनूँगा ?
आनन्द श्रावक की तरह बारह व्रत कब पालूँगा ?
पुणिया श्रावक जैसी सामायिक कब करूँगा ?
गौतम गणधर जैसा विनय कब करूँगा ?
इन सबने हमारी तरह छोटेपन से बडे़ होकर
महान कार्य किये थे । हम भी बडे़ होकर
उनके जैसे महान कार्य करेंगे, करेंगे, करेंगे । महान
होंगे, भाई महान होंगे । महान होकर आत्म उद्धार
करेंगे पूरे जगत का कल्याण करेंगे ।

अपेक्षित प्रश्न पाठ -5,हर रोझ सोचना..... (तत्त्व संस्कार विभाग)

1. सेवा के लिए किसे याद करेंगे  ?
2. त्याग, तप के लिए किसे याद करेंगे ?
3. श्रद्धा और व्रत के लिए किसे याद करेंगे ?

पाठ -6,ज्ञान वृद्धि के 11 बोल (तत्त्व संस्कार विभाग)
सम्यक्ज्ञान की प्राप्ती और वृद्धि के लिए मै नीचे दिये बोलों का ध्यान रखूँगा
1 ज्ञान सीखने के लिए उद्यम करने से ज्ञान बढ़ता है ।
2 नींद कम करके अभ्यास करने से ज्ञान बढ़ता है ।
3 भूख से कम खाकर अभ्यास करने से ज्ञान बढ़ता है ।
4 मौन रखकर अभ्यास करने से ज्ञान बढ़ता है ।
5. ज्ञानी के पास अभ्यास करने से ज्ञान बढ़ता है ।
6 गुरू का विनय करके अभ्यास करने से ज्ञान बढ़ता है ।
7. संसार के प्रति वैराग्य के साथ ज्ञान सीखने से ज्ञान बढ़ता है ।
8. सीखे हुए ज्ञान का परावर्तन करने से ज्ञान बढ़ता है ।
9. पाँचो इन्द्रियों को वश में करके अभ्यास करने से ज्ञान बढ़ता है ।
10. ब्रह्मचर्य का पालन करके अभ्यास करने से ज्ञान बढ़ता है ।
11. कपटरहित तप करने से ज्ञान बढ़ता है ।
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अपेक्षित प्रश्न पाठ -6,ज्ञान वृद्धि के 11 बोल (तत्त्व संस्कार विभाग)

1 ज्ञान वृद्धि के बोल कितने है ?
2 किसे वश में करने से ज्ञान बढ़ता है ?
3 किसका पालन करने से ज्ञान बढ़ता है ?
4 नींद और भूख कम करने का बोल कौन सा है  ?

पाठ -7,मेरा आत्मस्वरूपः अरूपी और अमर (तत्त्व संस्कार विभाग)

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अरूपी

आत्मा का कोई रूप नही है ।
आत्मा का भार नही है ।
आत्मा में सुगंध या दुर्गंध नही है ।
आत्मा में रस या स्वाद नही है ।
आत्मा में गरम या ठंडा स्पर्श नही है ।
आत्मा का मुलायम या खुरदरा स्पर्श नही है ।
आत्मा के लिए यश या अपयश नही है
आत्मा मोटा या पतला नही है ।
आत्मा बडा़ नही, छोटा भी नही है ।
आत्मा में वर्ण, गंध, रस या स्पर्श नही,
इसलिए आत्मा अरूपी है ।
इसलिए अरूपी आत्मा आँखों के द्वारा नही दिखती है ।
हम अपने चर्म चक्षु से ऐसी शुद्ध और सिद्ध आत्मा को नही देख सकते है ।
अरिहंत और सिद्ध भगवान आत्मा को देख सकते है ।
जो स्वयं शुद्ध हो, वही आत्मा, शुद्ध आत्मा को देख सकती है ।
इसलिए ऐसी आत्मा को हम अरूपी कहते है । मोक्ष में सभी आत्माएँ अरूपी होती है, इसलिए आत्मा दिखती नही और वे सिद्ध कहलाती है ।

अमर

जन्म लेना आत्मा का स्वभाव नही,
मृत्यु भी आत्मा का स्वभान नही,
क्योंकि आत्मा अमर है ।
परन्तु….आत्मा को कर्म के कारण जन्म लेना पड़ता है,
मरना पड़ता है,
परन्तु सिद्ध भगवान बनी हुई कर्म रहित आत्मा को
जन्म लेने का दुःख नही, मृत्यु की पीडा़ भी नही है ।
जहाँ जन्म और मृत्यु नही, उसे मोक्ष कहते है ।
मोक्ष में किसी भी प्रकार का दुःख नही है ।
मोक्ष में आनन्द ही आनन्द है ।
मोक्ष में आत्मा अमर बन जाती है, धर्म से आत्मा अमर बन जाती है ।
धर्म से हम भी मोक्ष में जा सकते है ।
हम भी अमर हो सकते है ।
मोक्ष में आत्मा को अरूपी और अमर कहते है ।

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अपेक्षित प्रश्न,पाठ -7,मेरा आत्मस्वरूपः अरूपी और अमर (तत्त्व संस्कार विभाग)

1 आत्मा का वजन कितना है ? स्वाद कैसा है ? स्पर्श कैसा है ?
2 आत्मा को कौन देख सकता है ?
3 मोक्ष में आत्मा को क्या कहते है ?
4 आत्मा क्यों नही दिखती ?
5 मोक्ष का अर्थ ?
6 जन्म मरण किसका स्वभाव नही है ?
7 मोक्ष में क्या है ?

कथा विभाग

कथा-1, श्री पार्श्वनाथ भगवान की अनुकंपा (कथा विभाग)

तापस का गाँव के बाहर आगमन

कथा-2, सती चंदनबाला (कथा विभाग)

चंपापुरी नगरी का राजा दधिवाहन था ।

कथा-3, सेवाभावी नंदीषेण मुनि (कथा विभाग)

एक लडका एकांत में खड़ा सोच रहा था-

काव्य विभाग

काव्य 1 हे प्रभु ! तेरे चरण कमल में......

(राग : अमी भरेली नजरूं राखो…..)

काव्य 2 उपकार किए मुझ पर.....!

(राग : संसार है इक नदिया…..)

 

काव्य 3 हे परमात्मा....!

(राग : हम न रहेंगे, तुम न रहोगे, यह प्यार हमारा…..)

काव्य 4 पंच परमेष्ठी है सार....!

पंच परमे,्ठी है सार, बाकी सब असार है..।।ध्रु।।