4shared Free songs

श्रेणी 3

सूत्र विभाग

प्रतिक्रमण प्रश्नोतर (सूत्र विभाग)

प्रतिदिन घर में से कचरा नही निकाले तो ?
घर गंदा (मलिन) हो जाता है ।
आत्मा में लगा हुआ पापरूपी कचरा प्रतिदिन निकालो ।
आत्मा को प्रतिदिन साफ करने के लिए प्रतिक्रमण करें ।
पाप को धोने की क्रिया को प्रतिक्रमण कहते है ।
प्रतिदिन आत्मा को पाप लगता है
इसलिए प्रतिदिन प्रतिक्रमण करना चाहिए ।
रात में पाप लगते है, इसलिए सुबह को प्रतिक्रमण करना चाहिए ।
दिन में पाप लगते है, शाम को प्रतिक्रमण करना चाहिए ।
प्रतिक्रमण करने के लिए आलस्य नही करना चाहिए ।
नही तो आत्मा मैली हो जाएगी ।

hjp1-60-1 copy
प्रतिक्रमण किसे कहते है ? (प्रतिक्रमण प्रश्नोतर, सूत्र विभाग)

प्रतिक्रमण अर्थात् पापों से वापस लौटना । पापों की आलोचना करना । व्रतों में लगे अतिचारों से वापस लोट के आचार में आना, प्रतिक्रमण कहलाता है ।

प्रतिक्रमण का दुसरा नाम क्या है ? (प्रतिक्रमण प्रश्नोतर, सूत्र विभाग)

प्रितक्रमण का दुसरा नाम आवश्यक सूत्र है ।

आवश्यक सूत्र किसे कहते है ? (प्रतिक्रमण प्रश्नोतर, सूत्र विभाग)

जो सूत्र चतुर्विध संघ के लिए सबसे पहले जानना और उभयकाल-सुबह-शाम करना जरूरी है, उसे ‘आवश्यक ‘ सूत्र कहते है ।

इस आवश्यक सूत्र कितने आवश्यक है ? (प्रतिक्रमण प्रश्नोतर, सूत्र विभाग)

आवश्यक सूत्र के छह आवस्यक (अध्ययन) है
1 सामायिक
2 चउविसथव
3 वदंना
4 प्रतिक्रमण
5 काउसग्ग
6 प्रत्याख्यान ।

प्रतिक्रमण (आवश्यक) कब किया जाता है ? (प्रतिक्रमण प्रश्नोतर, सूत्र विभाग)

नियमित रूप से सूर्यास्त के बाद दो घड़ी तक और सूर्योदय के पहले दो घड़ी  के अन्दर ऐसे दो बार प्रतिक्रमण करने की भगवान की आज्ञा है ।

प्रतिदिन दो बार प्रतिक्रमण (आवश्यक) करने से क्या फायदा (लाभ) होते है ? (प्रतिक्रमण प्रश्नोतर, सूत्र विभाग)

व्रतों मे लगे हुए दोषों का निवारण होता है और व्रतों की शुद्धि होती है । उत्कृष्ट रस आये तो तीर्थंकर नाम कर्म उपार्जन होता है ।

काल (समय) की अपेक्षा से प्रतिक्रमण कितने प्रकार के है कौन-कौन से है ? (प्रतिक्रमण प्रश्नोतर, सूत्र विभाग)

काल (समय) की अपेक्षा से प्रतिक्रमण के पाँच भाद है-
1 देवसिय प्रतिक्रमण- दिन में लगे पापों की आलोचना करने के लिए प्रतिदिन शाम को सूर्यास्त के बाद दो घड़ी के अन्दर किया जाता है ।
2 राइय प्रतिक्रमण- रात में लगे पापों की आलोचना करने के लिए रात्रि के अंतिम भाग में सूर्योदय से पहले दो घड़ी के अन्दर किया जाता है ।
3 पाक्षिक प्रतिक्रमण- 15 दिनों में लगे पापों की आलोचना करने के लिए महीने मे दो बार शाम को पक्खी (अमावास्या और पूर्णिमा)  पर्व के दिन किया जाता है ।
4 चउमासिक प्रतिक्रमण– चार महिनों में लगे, पापो की आलोचना करने के लिए कार्तिक पूर्णिमा, फाल्गुन पूर्णिमा तछा आषाढ़ पूर्णिमा की शाम को किया जाता है ।
सांवत्सरिक प्रतिक्रमण- साल भर में लगे पापो की आलोचना करने के लिए हर साल भाद्रपद शुक्ला पंचमी को संवत्सरी के दिन शाम को किया जाता है ।

प्रतिक्रमण किसका किया जाता है ? (प्रतिक्रमण प्रश्नोतर, सूत्र विभाग)

मिथ्यात्व, अव्रत, प्रमाद, कषाय और अशुभयोग का प्रतिक्रमण किया जाता है ।

रोज सुबह-शाम प्रतिक्रमण किये जाने पर भी पक्खी आदि के प्रतिक्रमण का महत्त्व क्यों है ? (प्रतिक्रमण प्रश्नोतर, सूत्र विभाग)

जिस तरह हम अपने घर में रोज सफाई करते है फिर भी त्यौहार और खास अवसरों पर ज्यादा ध्यान से सफाई करते है । फिर भी त्यौहार और खास अवसरों पर ज्यादा ध्यान से सफाई करते है । ठीक उसी तरह (प्रतिदिन) नियमित दोनों समय प्रतिक्रमण करने पर भी पर्व के दिनों में आत्मा की शुद्धि के लिए पक्खी, चौमासी या संवत्सरी आदि प्रतिक्रमण किये जाते है ।

प्रतिक्रमणकी आज्ञा लेने का पाठ कौनसा है ? (पाठ 1, इच्छामि णं भंते ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

‘इच्छामि णं भंते’ का पाठ, प्रतिक्रमण की आज्ञा लेने का पाठ है ।

इस पाठ में किसकी प्रतिज्ञा ली जाती है ? (पाठ 1, इच्छामि णं भंते ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

इस पाठ में प्रतिक्रमण करने की और ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप में लगे अतिचारों का चिन्तन करने के लिए काउसग्ग करने की प्रतिज्ञा ली जाती है ।

ज्ञान का अर्थ क्या है ? (पाठ 1, इच्छामि णं भंते ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

‘ज्ञान’ अर्थात् वस्तु को विशेष रूप से जानना ।

दर्शन का अर्थ क्या है ? (पाठ 1, इच्छामि णं भंते ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

‘दर्शन’ अर्थात् नवत्तत्व के ऊपर श्रद्धा रखना । दर्शन अर्थात् वस्तु का सामान्य बोध – यह कुछ है, इतनी ही जानकारी अर्थात् दर्शन।

चरित्ताचरित्त का अर्थ क्या है ? (पाठ 1, इच्छामि णं भंते ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

पापों का सर्वथा त्याग करना, उसे चरित्र कहते है । परन्तु श्रावक मिथ्यात्व का संपूर्ण और बाकी पापों का अंशिक (यथाशक्ति) त्याग करता है, इसलिए श्रावक व्रतों को ‘चरित्ताचरित्त‘ कहते है ।

तप किसे कहते है ? (पाठ 1, इच्छामि णं भंते ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

जिस क्रिया से आत्मा कै साथ जुड़े कर्मो का क्षय होता है, उसे ‘तप’ कहते है । जिस तरह अग्नि में तपने से सोना शुद्ध होता है, उसी तरह से तप करने से कर्म दीर होने से आत्मा शुद्ध होती है ।

अतिचार किसे कहते है ? (पाठ 1, इच्छामि णं भंते ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

व्रतों में लगने वाले दोषों को अतिचार कहते है ।

अतिचार और अनाचार में क्या अन्तर है ? (पाठ 1, इच्छामि णं भंते ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

अतिचार – व्रतों के आंशिक भंग

प्रत्याखान भूल जाने से या उसमें शंका उत्पन्न होने से व्रत में जो दोष लगता है उसे अतिचार कहते है ।

अनाचार – सर्वथा भंग

व्रत को तोड़ना उसे अनाचार कहते है

प्रतिक्रमणका संक्षेप में सार बताने वाला पाठ कौन सा है ? (पाठ 2, इच्छामि ठामि का पाठ ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

प्रतिक्रमण  का सार बताने वाला इच्छामि ठामि का पाठ है ।

'इच्छामि ठामि' को सार-पाठ क्यों कहते है ? (पाठ 2, इच्छामि ठामि का पाठ ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

इसमें ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप की प्राप्ति के लिए चार कषायों का त्याग तथा पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, तार शिक्षाव्रतरूपी श्रावक धर्म में लगे अतिचारों का मिच्छामि दुक्कडं दिया गया है, इसलिए यह सार-पाठ कहलाता है ।

अणुव्रत किसे कहते है ये कितने और कौन-कौन से है ? (पाठ 2, इच्छामि ठामि का पाठ ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

जिन व्रतों में हिंसा आदि पापों का मर्यादित (आंशिक) त्याग किया जाता है, उसे अणुव्रत कहते है ।महाव्रत की अपेक्षा से छोटे होने के कारण भी इन्हे अणुव्रत कहा जाता है । अणुव्रत पाँच है
1 स्थूल (बड़ी) हिंसा  का त्याग।
2 स्थूल झुठ का त्याग।
3 स्थूल चोरी का त्याग।
4 स्वस्त्री संतोष और परस्त्रि सेवन का त्याग।
5 स्थूल परिग्रह की मर्यादा ।

महाव्रत का अर्थ क्या है? (पाठ 2, इच्छामि ठामि का पाठ ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

‘महाव्रत’ अर्थात जिसमें हिंसा, झुठ, चोरी, मैथुन, परिग्रह आदि पापों का संपूर्ण त्याग किया जाता है ।

अणुव्रत और महाव्रत का पालन जीवन में कौन करता है ? (पाठ 2, इच्छामि ठामि का पाठ ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

अणुव्रत का पालन श्रावक और महाव्रत का पालन जैन साधु करते है ।

गुणव्रत किसे कहते है ये कितने है और कौन-कौन से है ? (पाठ 2, इच्छामि ठामि का पाठ ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

जो व्रत अणुव्रतों के गुणों में वृद्धि करते है, उन्हे गुणव्रत कहते है । गुणव्रत तीन है-
1 दिशा परिमाण व्रत
2 उपभोग-परिमाण व्रत
3 अनर्थदंड विरमण व्रत (6,7,8वाँ व्रत) ।

शिक्षाव्रत किसे कहते है ये कितने है और कौन-कौन से है ? (पाठ 2, इच्छामि ठामि का पाठ ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

मोक्षप्राप्ति के लिए कर्मक्षय का नियमित अभ्यास कराने वाली क्रियाओं की शीक्षा देने वाले व्रतों को शिक्षाव्रत कहते है । शिक्षाव्रत चार है
1 सामायिकव्रत
2 देशावगासिकव्रत
3 पौषधव्रत
4 अतिथि संविभाग व्रत (9 से 12 व्रत) ।

अकल्पनीय और अकरणीय में क्या अन्तर है ? (पाठ 2, इच्छामि ठामि का पाठ ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

अकल्पनीय - धारण किये हुए नियम से विरूद्ध आचरण करने का अर्थ अकल्पनीय है ।

अकरणीय अयोग्य पापकारी आचरण करने का अर्थ अकरणीय है ।

खंडियं और विराहियं में क्या अन्तर है ? (पाठ 2, इच्छामि ठामि का पाठ ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

व्रत का आंशिक भंग अर्थात् खंडियं और पूर्णतः भंग अर्थात् विराहियं है ।

इस पाठ में सबसे बड़ा एक पाप छिपा हुआ है, वह पाप कौन-सा है उसे किस शब्द से बताया गया है ? (पाठ 2, इच्छामि ठामि का पाठ ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

उस्सुत्तो – सूत्र विरूद्ध किया हो । यह सबसे बड़ा पाप है ।

'इच्छामि खमासमणो' का पाठ किसलिए बोला जाता है ? (पाठ 3, इच्छामि खमासमणो का पाठ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

गुरू को वंदन करने के लिए यह पाठ बोला जाता है ।

इस पाठ का दुसरा नाम क्या है ? (पाठ 3, इच्छामि खमासमणो का पाठ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

उत्कृष्ट वंदना का पाठ और द्वादशावर्त (बारह आवर्त) गुरू वंदना का पाठ ।

बारह आवर्त्तन कौन-कौन से ? (पाठ 3, इच्छामि खमासमणो का पाठ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

अहो, कायं, काय, जत्ताभे, जवणि, ज्जंचभे । यह छह आवर्त्तन और दूसरी बार याह पाठ बोलने से दूसरा छह आवर्त्तन । ऐसे 12 आवर्त्तन होते है ।

hjp1-63-1 copy
hjp1-63-2 copy
hjp1-63-3 copy
इस पाठ को कौन से आसन में बैठकर बोला जाता है ? (पाठ 3, इच्छामि खमासमणो का पाठ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

उकडू आसन में बैठकर बोला जाता है ।

'खमासमणो' का अर्थ क्या है ? (पाठ 3, इच्छामि खमासमणो का पाठ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

खमासमणो का अर्थ क्षमाश्रमण । जो क्षमापूर्वक तप करता है, उसे क्षमाश्रमण कहते है ।

सर्वकाल की आशातना शब्द से क्या तात्पर्य है ? (पाठ 3, इच्छामि खमासमणो का पाठ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

सर्वकाल की आशातना अर्थात् भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमान काल, इन तीनों कालों की सब आशातनाएँ ।

'सव्व धम्माइक्कमणाए' का अर्थ क्या है ? (पाठ 3, इच्छामि खमासमणो का पाठ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

‘सव्व धम्माइक्कमणाए’ का अर्थ सभी धर्म अनुष्ठानों के/नियमों के उल्लंघन या विराधना रूप आशातना ।

इस पाठ से की गई वंदना को क्यों उत्कृष्ट वंदना कहते है ? (पाठ 3, इच्छामि खमासमणो का पाठ,प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र, सूत्र विभाग)

इस पाठ से की हुई वंदना शब्द और क्रिया दोनों मे उत्तम है इसलिए ।

तत्त्व संस्कार विभाग

पाठ -1,छह काय के बोल (तत्त्व संस्कार विभाग)

इस जगत में मुख्य दो तत्त्व हैं – जीव और अजीव ।

पाठ -2,कंदमूल के त्याग से होने वाले लाभ (तत्त्व संस्कार विभाग)

सूई के अग्रभाग में जितना कंदमूल आता है, उसमें श्री भगवंत ने अनंत जीव फरमाए हैं ।

पाठ -3,जैम धार्मिक पर्व तिथियाँ (तत्त्व संस्कार विभाग)

जैन धर्म लोकोत्तर धर्म है ।

पाठ -4,मेरा आत्म स्वरूप (तत्त्व संस्कार विभाग)

1. मैं आत्मा हूँ, शरीर से भिन्न हूँ,

पाठ -5,राग का स्वरूप- 1. लोभ 2. माया (तत्त्व संस्कार विभाग)

जिनसे संसार का लाभ बढ़ता है, वे कषाय कहलाते हैं ।

कथा विभाग

कथा-1, नेम-राजुल(कथा विभाग)

बाईसवें (22 वें) तीर्थंकर श्री नेमिनाथ भगवान शौर्यपुर नगर के महान ऋद्धिवान राजा समुद्रविजय के महायशस्वी, बलवान, तेजस्वी पुत्र थे ।

कथा-2, गजसुकुमाल मुनि (कथा विभाग)

द्वारिका नगरी के राजा श्रीकृष्ण वासुदेव थे ।

कथा-3, आनंद श्रावक(कथा विभाग)

वाणिज्यग्राम नगर में जितशत्रु नाम का राजा राज्य करता  था ।

काव्य विभाग

काव्य 1 रत्नाकर पच्चिसी (गाथा 1 से 12 )

(राग : हरिगीत)

काव्य 2 मैत्रिभाव का पवित्र झरना

मैत्री भाव का पवित्र झरना, मेरे ह्रदय में बहा करे ।

काव्य 3दया तो सुख की खान

दया तो सुख की वेल है, दया हा सुख की खान।