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सूत्र विभाग

आगम (सिद्धांत) किसे कहते है ? (पाठ-4,ज्ञानातिचार सूत्र, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

जिससे तीर्थंकर द्वारा प्ररूपित छह द्रव्य, जीवादि नव तत्त्वों मे छोड़ने योग्य, जानने योग्य और आदरने योग्य तत्त्वों का स्मयग् ज्ञान होता है, उन्हे आगम कहते है ।

ज्ञान के पाठ में आगम कितने प्रकार के बताये गए है ये कौन-कौन से है ? (पाठ-4,ज्ञानातिचार सूत्र, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

आगम के तीन प्रकार है
1 सुत्तागमे – सूत्ररूप आगम
2 अत्थागमे – अर्थरूप आगम
3 तदुभयागमे – सूत्र और अर्थरूप आगम ।

सूत्र आगम किसे कहते है ? (पाठ-4,ज्ञानातिचार सूत्र, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

तीर्थंकरों के मुख से सुनी हुई वाणी को, गणधर आदि ने आचारांग आदि आदम रूप में गूंथकर, जिनकी सूत्र रूप में रचना की है, उन्हे सूत्र आगम कहते है ।

तीर्थंकरों के मुख से सुनी हुई वाणी को, गणधर आदि ने आचारांग आदि आदम रूप में गूंथकर, जिनकी सूत्र रूप में रचना की है, उन्हे सूत्र आगम कहते है ।
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आर्थ आगम किसे कहते है ? (पाठ-4,ज्ञानातिचार सूत्र, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
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तीर्थंकरों ने अपने श्रीमुख से जो भाव प्रकट किये है, उन अर्थ रूप आगमों को, अर्थ आगम कहते है । सूत्रों का अनुवाद-भाषान्तर को भी अर्थ आगम कहते है ।

 

उच्चारण शुद्धि के लिए किन बातों कै ध्यान रखना चाहिए ? (पाठ-4,ज्ञानातिचार सूत्र, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

पाठ के काना, मात्रा, अनुस्वार, पद, अक्षर, वगैरह ध्.न से पढ़ना, बोलना चाहिए । जैसे कि चेइयें सब्द की जगह चेवयं शब्द बोलने से, दोष लगता है । शुद्धि रखने के लिए नियमित पाठ का अभ्यास करना (परियट्टणा) या परावर्तना चाहिए ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ-4,ज्ञानातिचार सूत्र, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1. प्रतिक्रमण का चौथा पाठ किस विषय मे है ?
2. ज्ञान के पाठ के अतिचार कितने है और कौन-कौन से है ?

प्रतिक्रमण के पाँचवे पाठ में किसका स्वरूप बताया है ? (पाठ-5,दर्शन सम्यक्त्व का पाठ, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

समकित का ।

समकित का अर्थ क्या है ? (पाठ-5,दर्शन सम्यक्त्व का पाठ, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
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सुदेव, सुगुरू और उनके द्वारा प्रूपित नव तत्त्व आदि सुधर्म के प्रति यथार्थ श्रद्धा करना उसे समकित कहते है  ।
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जैन धर्म किसने बताया है ? (पाठ-5,दर्शन सम्यक्त्व का पाठ, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

राग-द्वेष रहित, केवलज्ञानी जिनेश्वर भगवंतो ने जैन धर्म बताया है ।

परमार्थ किस कहते है ? 'परपाखंड' का अर्थ क्या है ? (पाठ-5,दर्शन सम्यक्त्व का पाठ, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

नवतत्त्व आदि के विस्तृत ज्ञान को परमार्थ कहते है । ‘परपाखंड’ यानि कि जिनेश्वर द्वारा बताये धर्म के अलावा दुसरे धर्म ।

परमार्थ के जानने वालों के परिचय से क्या लाभ होता है ? (पाठ-5,दर्शन सम्यक्त्व का पाठ, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1. नया ज्ञान प्राप्त होता है।
2. अतिचार शुद्धि होती है।
3. शंका का निवारण होता है।
4. ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप नर्मल तथा द्रढ़ बनते है ।

जिन वचन में शंका कर सकते है क्या ? क्यों ? (पाठ-5,दर्शन सम्यक्त्व का पाठ, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

नही, नही, करना, क्योंकि शंका ज्ञानावरणीय कर्म तथा मोहनीय कर्म के उदय से बुद्धि की अल्पता से होती है । जबकि जिन वचन तो राग-द्वेष रहित है । उन कोवलज्ञानी जिनेश्वर ने फरमाया है, वही यथार्थ है, वही सत्य है । इसलिए जिनवचन मे श्रद्धा करके खुद की शंका दूर करनी चाहिए ।

परपाखंडी की प्रशंसा या परिचय क्यों नही करना ? (पाठ-5,दर्शन सम्यक्त्व का पाठ, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

परपाखंडी के धर्म में आडंबर, पूजा या चमत्कार में छह काय जीवों की हिंसा होती है । जहाँ हिंसा हो, वहाँ धर्म हो ही नही सकता । जीव हिंसा द्वारा जीव को दुर्गति और असाता ही मिलती है । इसलिए मोक्ष प्राप्ति की इच्छा वालों को परपाखंडी की प्रशंसा या परिचय नही करना चाहिए ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ-5,दर्शन सम्यक्त्व का पाठ, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 प्रतिक्रमण का पाँचवाँ पाठ किस विषय मे है ?
2 समकित के अतिचार कितने है कौन-कौन से  ?

व्रत अर्थ क्या है ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
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व्रत अर्थात् विरत्, नियम, मर्यादा मे आना ।

 

प्रथम व्रत को प्राणातिपात क्यों कहते है जीवों की हिंसा संबंधी होने से जीवातिपात क्यों नही कहते ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

त्रस या स्थावर जीवों के देशप्राण मे से किसी भी प्राण का नाश (हिंसा) करना, उसे प्राणातिपात कहते है । जीव अजर अमर है । उसका नाश नही हो सकता इसलिए इस व्रत को जीवातिपात न कहकर प्राणातिपात कहते है।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव का हनन करके मारने के पच्चक्खाण क्यों किये जाते है ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव मारने से मरते नही, जलाने से जलते नही, परन्तु उनकी हिंसा के पच्चक्खाण नही करने से अपच्चक्खाण की क्रीया द्वारा पाप लगता है ।

प्रथम अणुव्रत किसलिए है ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय आदि त्रस जीवों की हिंसा से बचने (त्याग) के लिए है ।

श्रावक त्रस जीवों की हिंसा का त्याग क्यों करता है ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

श्रावक संसार मे रहने के कारण सम्पूर्ण हिंसा का त्याग नही कर पाता है । सांसारिक कार्यों को करने में स्थावर जीवों की हिंसा न चाहते हुए भी होती है इसलिए चाहते हुए भी श्रावक स्थावर जीवों की हिंसा का त्याग नही कर पाता है । इसलिए श्रावक त्रस जिवों की हिंसा से बचने का प्रयास करता है ।

शरीर के लिए पीड़ाकारी के उदाहरण दीजिए ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

कृमि, जूँ, जलोदर, लीख आदि ।

आकुट्टी (हनने) की बुद्धि से हनन करने का पच्चक्खाण का अर्थ क्या है ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

कषायवश, निर्दयता पूर्वक प्राणरहित करना, मारने की इच्छा से मारना, उसे आकुट्टी से मारना कहते है, उसके पच्चक्खाण श्रावक करते है ।

जीव को मारने वाले को पाप क्यों लगता है ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

मारने की दुष्ट भावना और दुष्ट प्रवृत्ति से जीव को मारने वाले को पाप लगता है । इसलिए प्रत्येक कार्य यतना (यत्ना) पूर्वक (पयग से), हिंसा न हो इसी तरह करना चाहिए ।

अहिंसा व्रत के पालन से कौन-से गुणों की प्राप्ति होती है ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

करूणा, क्षमा, दया, कोमलता, मैत्री आदि अनेक गुणों की प्राप्ति और वृद्धि होती है ।

पहले व्रत की कोटि कितनी है ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

पहले व्रत 2 करण और 3 योग से (दुविहं, तिविहेणं) पच्चक्खाण लेकर किया जाता है ।

2 करण x 3 योग = 6 कोटि है ।

प्रथम व्रत के अतिचार कितने है ? कौन-कौन से है ? (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

प्रथम व्रत के पाँच अतिचार है । बंधे से भत्तपाणवोच्छेए तक ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 6, अहिंसा अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 जैनों की कुल देवी कौन है  ?
2 पहले व्रत की कोटि कितनी है ?
3 प्रथम व्रत के अतिचार कितने है ? कौन कौन से ?
4 प्रथम अणुव्रत कितने समय के लिए लिया जाता है ?

दूसरा अणुव्रत किसलिए है ? (पाठ 7, सत्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
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बड़े झुठ से निवृत होने के लिए ।

 

बड़े झुठ कितने प्रकार के व कौन कौन से है ? (पाठ 7, सत्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

बड़े झुठ पाँच प्रकार के है – कन्यालीक, गवालीक, भूम्यलीक, न्यासापहार, कूट साक्षी ।

दूसरे अणुव्रत में इत्यादि शब्द से कौन सा झुठ समझना ? (पाठ 7, सत्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

झुठा इलजाम लगाना, विश्वासघात करना, भगवान की झुठी सौगन्ध खाना, झुठा उपदेश देना, राजकीय बड़ा झुठ बोलना वगैरह ।

सत्यव्रत के पालन से कौन से गुणों की प्राप्ति होती है ? (पाठ 7, सत्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

निडरता, दूसरों का विश्वास प्राप्त होता है, लोगों मे प्रिय बनते है, आदेय नामकर्म की प्राप्ति होती है, आदि अनेक लाभ होते है ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 7, सत्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 दूसरे व्रत की कोटि कितनी है ?
2. दूसरे व्रत के अतिचार कितने है ? कौन-कौन से है ?
3 दूसरा अणुव्रत कितने समय के लिए लिया जाता है ?

अदत्तादान का अर्थ क्या है ? (पाठ 8, अचौर्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
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किसी भी चीज को उसके मालिक की अनुमति (आज्ञा) बिना लेना अदत्तादान का मतलब चोरी है ।
तीसरे व्रत में कितने प्रकार की चोरी का त्याग होता है ? (पाठ 8, अचौर्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

तीसरे व्रत में मुख्य चार प्रकार की स्थूल चोरी कै त्याग होता है-
1 दीवार में सेंध लगाकर घर में घुसना अथवा शस्त्र से या जबरदस्ती से मुसाफिरों को या घर को लुंटना
2 जैब काटनी
3 ताले तोड़ना
4 किसी की किरी हुई चीज उठाकर खुद ले लेना ।

तीसरे व्रत में आगार को स्थान क्यों दिया गया है ? (पाठ 8, अचौर्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

सगे-समबन्धियों के साथ पहचान के कारण प्रतिदिन उपयोग की चीजें उनसे पूछे बिना लेना, ताला खोलना, वगैरह किये जाते है । इसलिए उसका आगार रखा जाता है ।

बड़ी चोरी किसे कहते है ? छोटी चोरी क्या है ? (पाठ 8, अचौर्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

बिना पूछे किसी की ऐसी चीज लेना जिससे उसे दुःख हो, लोक निंदा हो, राजदंड मिले, उसे बड़ी चोरी कहते है । चोरी का भाव न हो लेकिन खुद के उपयोग के लिए बिना आज्ञा कागज-पेन्सिल जैसी सामान्य या तुच्छ चीजें लेना, उसे छोटी चोरी कहते है ।

अचौर्य व्रत के पालन से किन गुणों की प्राप्ति होती है ? (पाठ 8, अचौर्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

लोगों के विश्वासपात्र बन सकते है, स्नेहीजनों का प्रेम मिलता है, यश कीर्ति मिलती है, नर्भयता आदि गुण आते है ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 8, अचौर्य अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 तीसरे व्रत की कोटि कितनी है ?
2 तीसरे व्रत के अतिचर कितने है ? कौन-कौन से है ?
3 तीसरा अणुव्रत कितने समय के लिए लिया जाता है ?

स्वपत्नी (स्वदारा) संतोष कितने प्रकार के है ? (पाठ 9, ब्रह्मचर्य अणुव्रत (स्वदारा सन्तोष व्रत), प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
अनेक प्रकार के है । जैसे कि
1 एक बार शादी करने के बाद दूसरी शादी नही करना ।
2 पत्नी के मृत्यु के बाद दूसरी शादी नही करना, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना ।
3 कुछ तिथियों, पर्वों और श्रावण महीने मे ब्रह्मचर्य का पालन करना ।
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ब्रह्मचर्य पालन के लिए किस तरह चिंतन करना चाहिए ? (पाठ 9, ब्रह्मचर्य अणुव्रत (स्वदारा सन्तोष व्रत), प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तप है । ब्रह्मचारी को देवता भी नमस्कार करते है
2 कामभोग जहर के समान घातक है, उससे शरीर में भयंकर रोगो की उत्पत्ति होती है।
3 नरक आदि दुर्गति प्राप्त होती है ।
4 ब्रह्मचर्य के पालक जम्बूकुमार, मल्लिनाथ जी, राजीमती वगैरह का जीवन कितना उज्जवल और सुन्दर बना था । ऐसा चिन्तन करना चाहिए ।

ब्रह्मचर्य पालन के लिए क्या करना चाहिए ? (पाठ 9, ब्रह्मचर्य अणुव्रत (स्वदारा सन्तोष व्रत), प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 सिनेमा, टी.वी. ना देखें, ऐसा अभ्यास करना चाहिए ।
2 मर्यादा वाले वस्त्र पहनने चाहिए ।
3 महापुरूषों के जीवन की किताबें पढ़नी चाहिए ।

ब्रह्मचर्य के पालन से क्या लाभ होता है ? (पाठ 9, ब्रह्मचर्य अणुव्रत (स्वदारा सन्तोष व्रत), प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

ब्रह्मचर्य के पालन से
1 शरीर निरोगी रहता है ।
2 ह्रदय बलवान बनता है
3 इन्द्रियाँ सतेज बनती है ।
4 बुद्धि तीक्ष्ण बनती है ।
5 चित स्वस्थ रहता है ।
6 कषायों की और विकारों की उपशांतता होती है ।
7 मोहभाव घटता है ।
8 व्रत-नियम-संयम की वृद्धि होती है ।
9 भौतिक और आत्मिक आदि अनेक लाभ होते है ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 9, ब्रह्मचर्य अणुव्रत (स्वदारा सन्तोष व्रत), प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 चौथे व्रत की कोटी कितनी है ?
2 चौथे व्रत के अतिचार कितने है ? कौन-कौन से है ?
3 चौथे व्रत को कितने समय के लिए लिया जाता है ?

पाँचवाँ अणुव्रत किसके लिए है ? (पाठ 10, अपरिग्रह अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
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वर्तमान समय मे खुद के पास जितना परिग्रह है, उतना या उससे ज्यादा या कम परिग्रह की मर्यादा करने के लिए है ।
परिग्रह का अर्थ क्या है ? (पाठ 10, अपरिग्रह अणुव्रत , प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

परिग्रह अर्थात् मूर्च्छा (आसक्ति), ममत्व भाव (मेरापन)
परिग्रह कितने है कौन कौन से है
परिग्रह 9 है
1 खेत्त
2 वास्तु
3 हिरण्य
4 सुवर्ण
5 धन
6 धान्य
7 द्विपद
8 चतुष्पद
9 कुप्य

परिग्रह की मर्यादा कैसे करे ? (पाठ 10, अपरिग्रह अणुव्रत , प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

खुद की रोज की या वार्षिक जरूरत की चीजों से थोड़ा छूट रखकर परिग्रह की मर्यादा करनी । जैसे कि साल में 10 जोड़ी कपड़े प्रयोग करने हो तो 13 जोड़ी से ज्यादा नही रखना, ऐसी मर्यादा करनी । (वैसे तो खुद की जरूरत घटाने की भावना रखनी चाहिए । परन्तु जब तक वैसा नही कर सकते तब तक उपरोक्त अनुसार मार्यादा करनी चाहिए ।)

अपरिग्रह व्रत का पालन करने से क्या लोभ होते है ? (पाठ 10, अपरिग्रह अणुव्रत , प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

परिग्रह पाप का कारण है, इसके लिए जीव हिंसा, सच्चा-झुठा, मुकदमा, चोरी वगैरह करके पाप बढ़ाता है, इसलिए अपरिग्रह व्रत का पालन करना चाहिए । उससे
1 बुरे विचारों से मुक्ति मिलती है।
2 चीजों में आसक्ति कम होती है।
3 जीव संतोषी बनता है।
4 मुकदमे, झगड़े आदि मिटते है।
5 धीरे-धीरे सम्पूर्ण अपरिग्रही भी बन सकते है ।

इस व्रत में अतिचार और अनाचार कैसे लगते है ? (पाठ 10, अपरिग्रह अणुव्रत , प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

जिस बोल की जितनी मर्यादा की हो, अनजाने में, शंका से मर्यादाएँ भंग हो जैएँ तो अतिचार है । लोभ आदि के कारण जानबूझकर ली गई मर्यादा का पालन नही करना अनाचार है ।

 

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 10, अपरिग्रह अणुव्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 पाँचवे व्रत की कोटी कितनी है ?
2 पाँचवे व्रत के अतिचार कितने है कौन कौन से है ?
3 पाँचवाँ अणुव्रत कितने समय के लिए लिया जाता है  ?

छठ्ठा व्रत किसलिए है ? (पाठ 11, दिशा परिमाण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
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छठ्ठा व्रत दिशाओं की मर्यादा करने के लिए है ।

 

दिशा की मर्यादा कितने प्रकार से की जाती है ? (पाठ 11, दिशा परिमाण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

दिशाएँ छह है । जिस दिशा में जितना जाना पड़े उतनी मर्यादा करनी । जैसे कि ऊँचे पर्वत या हवाई जहाज से अमुक कि.मी. से ज्यादा ऊपर जाना नही । गहरी खदान में अमुक कि.मी. से ज्यादा नीचे जाना नही । पूरमव, पश्चिम, उत्तर या दक्षिण दिशाओं में (तिरछा) अमुक किम.मी. से आगे जाना नही । इस तरह ऊँची, नीची और तिरछी दिशा की मर्यादा की जाती है ।

 

दिशा परिमाण (मर्यादा) से क्या लाभ होते है ? (पाठ 11, दिशा परिमाण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

लोक अशंख्यात योजन क्रोड़ा-क्रोड़ी विस्तार का है । दिशाओं की मर्यादा करने से मर्यादा के बाहर जाने का त्याग होने से उस जगह होती हुई हिंसा आदि पापों का कर्मबन्ध रूकता है ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 11, दिशा परिमाण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 छठे व्रत की कोटि कितनी है ?
2 छठे व्रत के अतिचार कितने है ? कौन कौन से है ?
3 छठ्ठा अणुव्रत कितने समय के लिए जाता है ?
4 प्रथम गुणव्रत कौन-सा है ?

उपभोग-परिभोग किसे कहते है ? (पाठ 12, उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

जो पदार्थ सिर्फ एक ही बार उपयोग में लिया जाता है, उसे उपभोग कहते है । जैसे कि अनाज, पानी, वगैरह । जो पदार्थ बार-बार उपयोग में ले सकते है, उन्हे परिभोग कहते है । जैसे कि वस्त्र, आभुषण, शय्या वगैरह ।
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उपभोग –परिभोग परिमाण व्रत का अर्थ क्या है ? (पाठ 12, उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

उपभोग-परिभोग योग्य वस्तुओं की मर्यादा करना । सातवें व्रत में बताये 26 बोल की मर्यादा तरना तथा 15 करामादान का त्याग करना ।

सचित्त त्याग से क्या लाभ होते है ? (पाठ 12, उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 स्वाद पर जीत
2 अचित्त वस्तु खाने की सुविधा न हो वहाँ संतोष
3 पू. साधु-साध्वीयों को सुझता, निर्दोष, अचित आहार पानी बोहरा सकते है
4 तिथि और पर्व के दिनों में घर में तरकारी-सब्जी आदि का आरम्भ नही होता ।
5 जीवों के प्रति विशेष अनुकम्पा बढ़ती है ।

कर्मादान किसे कहते है ? (पाठ 12, उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत , प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

जिन व्यापार और कार्यों में विशेष हिंसा आदि कारणों से कर्मों का विशेष बंध होता है, उन्हे कर्मदान कहते है ।

पाँचवाँ और सातवाँ व्रत एक करण और तीन योग से क्यों ग्रहण किया जाता है ? (पाठ 12, उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत , प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

श्रावक पाँचवे और सातवें व्रत की मर्यादा अपनी जरूरत जितनी ही कर सकती है, इसलिए खुद मन, वचन, काया से करना नही, ऐसे पच्चक्खाण ले सकता है । परन्तु परिवार आदि की जवाबदारी के कारण परिग्रह आदि मन, वचन, काया से, कराना नही, अनुमोदन करना नही ऐसे पच्चक्खाण ले तो व्रत भंग होने की सम्भावना रहती है ष इसलिए एक करण तीन योग से पच्चक्खाण लेते है ।

रात्रि भोजन का त्याग कौन-से व्रत में आता है ? (पाठ 12, उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत , प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

रात्रि भोजन का त्याग अपेक्षा से सातवें व्रत में आता है । उपभोग और परिभोग की काल आश्रित (रात्रि की) मर्यादा करे, तो इसका पालन हो सकता है ।

उपभोग-परिभोग की वस्तुओं की मर्यादा से क्या लाभ होता है ? (पाठ 12, उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत , प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 इच्छा कम होती है, आवश्यक्ताएँ घटती है ।
2 जीवन संतोषी और त्यागी बनता है ।
3 धर्म आचरण के लिए ज्यादा समय मिलता है ।
4 बहुत बड़ा कर्मबंध रूकता है ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 12, उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत , प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 सातवे व्रत की कोटि कितनी है ?
2 भोजन सम्बन्धी अतिचार कौन-कौन से और कितने है ?
3 सातवाँ अणुव्रत कितने समय के लिए लिया जाता है ?
4 दूसरा गुणव्रत कौन-सा है ?

दंड किसे कहते है? अनर्थ दणड का अर्थ क्या है ? (पाठ 13, अनर्थ दंड विरमण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
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मन, वचन, काया की अशुभ प्रवृत्ति, जिससे आत्मा को दंड मिलता है, उसे दंड कहते है । जो कार्य खुद के या परिवार के क्सी हित का न हो, जिसका कोई प्रयोजन न हो और जिस कारण व्यर्थ हिंसा होने से, आत्मा पापों से दंडित होती है, उसे अनर्थदंड कहते है ।
आत्मा को अनर्थदंड का पाप लगे, ऐसे कार्य लिखो । (पाठ 13, अनर्थ दंड विरमण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

विकथा करना, खराब या झुठ उपदेश देना, पानी के नल खुला रखना, बिना जरूरत वस्तुओं की खरीदी करना आदि प्रवृत्तियों को अनर्थदंड कहते है ।

अनर्थदंड कितने प्रकार के है ? कौन-कौन से है ? (पाठ 13, अनर्थ दंड विरमण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

अनर्थदंड चार प्रकार के है
1 अपध्यानाचरित
2 प्रमादचरित
3 हिंसा प्रदान
4 पापोपदेश ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 13, अनर्थ दंड विरमण व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 आठवें व्रत की कोटि कितनी है ?
2 आठवें व्रत के अतिचार कितने है और कौन कौन से है ?
3 आठवाँ अणुव्रत कितने समय के लिए लिया जाता है ?
4 तीसरा गुणव्रत कौन-सा है ?

साधु की और श्रावक की सामायिक मे क्या अन्तर है ? (पाठ 14, सामायिक व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
साधु की सामायिक यावज्जीवन होती है । श्रावक की निश्चित समय के लिए (दो घड़ी, चार घड़ी वगैरह) होती है ।
2 साधु की सामायिक 3 करण और 3 योग से अर्थात् 9 कोटि से ली जाती है । श्रावक की सामायिक सामान्य रूप से 2 करण और 3 योग से याने 6 कोटि से अथवा 8 कोटि से ली जाती है ।
( 8 कोटिका पाठ-करतंपिअन्नं न समणुजाणामि, वयसा कायसा, शब्द बोले जाते है । )
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अपेक्षित प्रश्न (पाठ 14, सामायिक व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 सावद्य योग किसे कहते है ?
2 नववें व्रत के अतिचार कितने है और कोन कौन से है ?
3 सामायिक कितनी है ?
4 प्रथम शिक्षा व्रत कौन सा है  ?

देशावगासिक व्रत किसे कहते है ? (पाठ 15, देशावगासिक व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

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पहले के सभी व्रतों में मर्यादाएँ यावज्जीवन के लिए की थी, उसे और कम करके अधिक से अधिक मर्यादाएँ प्रतिदिन के लिए करनी, उसे देशावगासिक व्रत कहते है।

 
वर्तमान मे यह व्रत संक्षेप मे किस तरह किया जाता है ? (पाठ 15, देशावगासिक व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

वर्तामान मे चौदह नियम से किया जाता है-
1 सचित्त मर्यादा – खाने पीने की सचित्त वस्तु की मर्यादा ।
2 द्रव्य – खाने पीने के कुल द्रव्यों की मर्यादा ।
3 विगय – दुध, दही, घी, तैल, गुड़, शक्कर की मर्यादा ।
4 स्नान – स्नान की संख्या तथा पानी की मर्यादा ।
5 जूते – बूट-चप्पल की संख्या की मर्यादा ।
6 दिशा – चारों दिशा मे जाने की मर्यादा ।
7 शयन – सोने-बैठने के पलंग, सोफा, कुर्सी आदि की मर्यादा ।
8 ब्रह्मचर्य – यथाशक्ति ब्रह्मचर्य पालना ।
9 कुसुम (फूल) – फूल तथा सुगन्धित द्रव्यों की मर्यादा ।
10 विलेपन – शरीर पर लगाने का क्रीम, पाउडर, तैल आदि की मर्यादा ।
11 वाहन – वाहन की संख्या की मर्यादा ।
12 वस्त्र – हर रोज पहनने के, उपयोग में आने वाले वस्त्रों की मर्यादा ।
13 भोजन – दिन में कितनी बार और कितना आहार करने की मर्यादा ।
14 मुखवास – मुखवास कितनी तरह सके और कितना खाने की मर्यादा ।
ऊपर दी गई धारणा प्रमाणे पच्चक्खाण एगविहं तिविहेणं, न करेमि, मणसा, वयसा, कायसा, तस्स भंते पडिक्कमामि, निंदामी, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि ।

छठ्ठे व्रत और दसवें मे क्या फर्क है ? (पाठ 15, देशावगासिक व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

छठ्ठे व्रत में दिशा की मर्यादा के जावज्जीव (यावज्जीवन) के पच्चक्खाण किये जाते है । दसवे व्रत में एक दिन-रात्रि के लिए दिशा और भोग-उपभोग की मर्यादा की जाती है ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 15, देशावगासिक व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 दसवे व्रत के अतिचार कितने है और कौन कौन से ?
2 दसवाँ व्रत कितनी कोटि से ग्रहण किया जाता है ?
3 एक अहोरात्रि आर्थात् कितना समय ?
4 मुनि जीवन की झाँकी का व्रत कौन सा है ?
5 दसवाँ व्रत लेने की तथा परना की विधि क्या है (प्रतिक्रमण की पुस्तक के आधार से तैयार करे ।) ?
6 दूसरा शिक्षाव्रत कौन सा है  ?

पौषध व्रत का क्या मतलब है ? (पाठ 16, प्रतिपूर्ण पौषध व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)
ज्ञान, दर्शन और चरित्र द्वारा आत्मा का पोषण करना ।
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प्रतिलेखन, प्रमार्जन का क्या मतलब ? (पाठ 16, प्रतिपूर्ण पौषध व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

वस्त्र आदि उपयोग में आने वाले सभी उपकरणों में कोई जीव है या नही, उसका निरीक्षण (देखना) करना, उसे प्रतिलेखन कहते है । जीव आदि दिखे तो उन्हे यतनापूर्वक हल्के हाथ से पूंजणी या रजोहरण से सुरक्षित स्थान में रखना, उसे प्रमार्जन कहते है ।

पौषध में या दसवे व्रत में प्रतिलेखन या प्रमार्जन किस-किसका करना चाहिए ? (पाठ 16, प्रतिपूर्ण पौषध व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

पोषध में या दसवें व्रत मे
1 मुँहपत्ति
2 पूंजणी
3 रजोहरण
4 वस्त्र (इस क्रम से)
5 शय्या संस्तारक
6 पौषधशाला
7 परठने की भूमि
8 गोचरी के पात्र
9 पुस्तक आदि उपयोग में ली हुई वस्तुओं कै प्रतिलेखन करना चहिए ।

पौषध व्रत में किसका पच्चक्खाण किया जाते है ? (पाठ 16, प्रतिपूर्ण पौषध व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 चारों आहार के
2 अब्रह्म का सेवन नही करते
3 आभूषण और सोना साथ मे नही रखना
4 भूल की माला पहनना नही
5 चंदन आदि का विलेपन नही करना
6 शस्त्र मुसल आदि से होने वाले 18 प्रकार के पापकारी कार्य नही करना के पच्चक्खाण किया जाते है ।
( पौषध व्रत ग्रहण करने की तथा पारने की विधि प्रतिक्रमण के पुस्तक के आधार से तैयार करे ।)

प्रहर का अर्थ क्या है पौषध कितने प्रहर का किया जाता है ? (पाठ 16, प्रतिपूर्ण पौषध व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

प्रहर आर्थात दिन या रात्रि का चौथा भाग । (अंदाज से पौने तीन से तीन घण्टे) उसे पोरसी भी कहते है । सम्पूर्ण पौषध आठ प्रहर का होता है । मात्र रात्रि का पौषध करना हो, तो चार प्रहर का रात्रि पौषध ग्रहण कर सकते है ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 16, प्रतिपूर्ण पौषध व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 11वाँ व्रत कितनी कोटी से ग्रहण किया जाता है
2 11वाँ व्रत के अतिचार कितने है और कौन कौन से है
3 11वाँ व्रत कितने समय के लिए (अथवा प्रहर के लिए) ग्रहण किया जाता है
4 तीसरा शिक्षाव्रत कौन सा है

अतिथि संविभाग व्रत का अर्थ क्या है ? (पाठ 17, अतिथि संविभाग व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

गृहस्थी के अपने उपयोग में आने वाली, जैसे आहार आदि 14 प्रकार की चीजें, जिनका आने की तिथि या समय निश्चित नही होता वैसे पंचमहाव्रतधारी साधु-साध्वीजी को सिर्फ आत्म कल्याण की भावना से बोहराना, उसे अतिथि संविभाग व्रत कहते है । हर एक श्रावक को ऐसा लाभ लेने की रोज भावना भानी चाहिए ।
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पाडिहारी और अपाडिहारी चीजें किसे कहते है ? (पाठ 17, अतिथि संविभाग व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

जिस चीज को साधु-साध्वी बोहराने के बाद वापस नही देते, उसे अपाडिहारी चीजें कहते है । जिन चीजों को साधु-साध्वीजी बोहराने के बाद खुद के उपयोग में लेकर वापस दे देते है, उन्हे पाडिहारी चीजे कहते है ।

पू. साधु-साध्वीजी को कितनी चीजे बोहरा सकते है उसमें पाडिहारी और आपाडिहारी चीजे कौन-कौन सी है ? (पाठ 17, अतिथि संविभाग व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

पू. साधु-साध्वीजी को 14 प्रकार की चीजें बोहरा सकते है
अपाडिहारी चीजे 8 है –
1 आहार
2. पानी
3. मेवा-मिठाई
4 मुखवास
5 वस्त्र
6 पातरा
7 कम्बल
8 रजोहरण

पाडिहारी चीजें 6 है
1 चोरंग / बाजोट, छोटा पाट आदि ।
2 पाट, फलक
3 शय्या, मकान
4 संस्तारक
5 औषध
6 भेषज

औषध और भेषज में क्या अन्तर है ? (पाठ 17, अतिथि संविभाग व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

सूंठ, हल्दी, आँवला, हरडा, लोंग आदि एक-एक द्रव्य औषध है । हिंगाष्टक चूर्ण, त्रिफला वगैरह मिश्र द्रव्य वाली चीजें भेषज कहलाती है ।

क्या पू. साधु-साध्वीजी को बोहराने लायक चीजें 14 ही है ? (पाठ 17, अतिथि संविभाग व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

मुख्यतः ये 14 चीजें साधु-साध्वी के उपयोग में आती है । इसलिए उनके बारे में बताया गया है । इनके अलावा धार्मिक पुस्तकें, सूई, कैंची आदि समझना ।

क्या पू. साधु-साध्वीजी ही दान के पात्र है ? (पाठ 17, अतिथि संविभाग व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

पू. साधु-साध्वीजी को दान देना सुपात्रदान कहलाता है, इसलिए इस व्रत में उसका उल्लेख किया गया है । प्रतिमाधारी श्रावक, व्रतधारी श्रावक और स्वधर्मी को भी दान कर सकते है । उसके सिवाय दूसरों को दिया गया दान अनुकंपा से दिया हुआ दान है ।

तीर्थंकर को 14 दान में से कितने और कौन-कौन से दान दिया जाते है ? (पाठ 17, अतिथि संविभाग व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

तीर्थंकर वस्त्र, पात्र, कंबल और रजोहरण नही रखते, इसलिए उन्हे 4 दान के अलावा 10 दान दे सकते है ।

बारहवें (12वें) व्रत के धारकको मुख्यतः कौन-कौन सी चीजों का ध्यान रखना चाहिए ? (पाठ 17, अतिथि संविभाग व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 रसोई बनाने वाले और खाने वाले को सचित्त वस्तु से दूर बैठना चाहिए ।
2 घरमें भी सचित्त और अचित्त चीजों को अलग-अलग रखने की व्यव्स्था करनी चाहिए ।
3 कच्चे पानी की बूँदे, हरी वनस्पति, सब्जी का कचरा घर की जमीन पर पैला हुआ नही रखना ।
4 अचित्त पानी बनाया हो, उसे शाम तक रखना ।
5 गोचरी के समय घर के दरवाजे खुले रखने का विवेक रखना ।
6 खुद सूझते हो तो खुद बोहराने की उत्कृष्ट भावना रखनी ।
7 गोचरी की विधि की जानकारी पू. साधु-साध्वीजी से जान लेना और ज्ञान को बढ़ाना ।
8 खुद सूझते या असूझते हो, वह सच बताना ।

अपेक्षित प्रश्न (पाठ 17, अतिथि संविभाग व्रत, प्रतिक्रमण पाठ 4 से 12वें व्रत के प्रश्नोत्तर,सूत्र विभाग)

1 करण, कोटि बिना व्रत कौन सा है ?
2 बारहवें व्रत अतिचार कितने है और कौन कौन से है ?
3 बारहवे व्रत किसकी भावना भाई जाती है ?
4 चौथा शिक्षाव्रत कौन सा है ?

12 व्रत और संथारा के करण, योग, कोटि की जानकारी बताने वाला कोष्टक- सूत्र विभाग)
व्रत करण योग कोटि विगत
1 2 x 3 = 6 दुविहं तिविहेणं
2 2 x 3 = 6 दुविहं तिविहेणं
3 2 x 3 = 6 दुविहं तिविहेणं
4 2 x 3 = 6 देवता सम्बन्धी दुविहं तिविहेणं
1 x 1 = 1 मनुष्य-तिर्यंच सम्बन्धी एगविहं एगविहेणं
5 1 x 3 = 3 एगविहं एगविहेणं
6 2 x 3 = 6 दुविहं तिविहेणं
7 1 x 3 = 3 एगविहं एगविहेणं
8 2 x 3 = 6 दुविहं तिविहेणं
9 2 x 3 = 6 दुविहं तिविहेणं
10 2 x 3 = 6 द्रव्यादि की मर्यादा के बाहर

दुविहं तिविहेणं

1 x 3 = 3 द्रव्यादि की मर्यादा के अन्दर

दुविहं तिविहेणं

11 2 x 3 = 6 दुविहं तिविहेणं
12 0 x 0 = 0 बिना करण कोटि का व्रत
संथारा 3 x 3 = 9 तिविहं तिविहेणं
महाव्रत और अणुव्रत में क्या फर्क है ?(सूत्र विभाग)
महाव्रत अणुव्रत
1 साधु धारण करते है। 1 श्रावक ग्रहण करते है
2 3 कोटि और 3 योग अर्थात् 9 कोटि से धारण किये जाते है । (3 करण-करना, कराना और अनुमोदना । 3 योग-मन, वचन, काया) 2 श्रावक के व्रत 2 करण 3 योग/एक करण-एक योग से/1 करण 3 योग से ऐसे 6 कोटि से/1 कोटि से/3 कोटि से ग्रहण किये जाते है ।
3 यावज्जीवन के लिए, धारण करते है । तीर्थंकर, गणधर आदि महापुरूष ग्रहण करते है इसलिए महाव्रत कहलाते है । 3 एक साल से यावज्जीवन तक या अपनी इच्छानुसार व्रत धारण करते है ।
4 सम्पूर्ण जीव हिंसा, सम्पूर्ण झूठ, सम्पूर्ण चोरी, सम्पूर्ण मैथुन तथा सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग किया जाता है । 4 स्थूल (बड़ी) जीव हिंसा, स्थूल झूठ, स्थूल चोरी, स्थूल मैथुन तथा स्थूल परिग्रह ता त्याग किया जाता है ।
5 महाव्रत 5 है । 5 अणुव्रत 5, गुणव्रत 3, शिक्षाव्रत 4. कुल 12 व्रत है ।
6 पाँच महाव्रत की भावना 25, अतिचार 125 है । 6 12 व्रत के अतिचार 99 है ।
7 महाव्रतधारी साधु के गुणस्थान 6 से 14 है । 7 अणुव्रतधारी श्रावक का गुणस्थान पाँचवाँ है ।
8 1 से 5वीं नरक तक से निकले जीव पंचमहाव्रतधारी साधु बन सकते है । 8 1 से 6वीं नरक तक से निकले जीव अणुव्रत धारण कर सकते है । श्रावक बन सकते है ।
9 जघन्य अष्टप्रवचन माता का ज्ञान होता है । (5 समिति, 3 गुप्ति) 9 नवतत्त्व का ज्ञान और श्राद्धा होती है । जघन्य नवकारसी व्रत करते है ।
10 आराधक साधु कालधर्म पाकर वैमानिक देव में पाँचवे अनुत्तर विमान तक तथा मोक्ष मे जा सकते है । अन्य कहीं नही । 10 आराधक श्रावक वैमानिक के 12 देवलोक, 9 लोकांतिक में जैता है ।

तत्त्व संस्कार विभाग

पाठ -1,पैंतीस बोल (तत्त्व संस्कार विभाग)

पैंतीस बोल ।

पाठ -2,पटाखे-समय, शक्ति और सम्पति का अपव्यय (तत्त्व संस्कार विभाग)

पटाखे-समय, शक्ति और सम्पति का अपव्यय ।

पाठ -3,टी.वी. का दुषण (तत्त्व संस्कार विभाग)

टी.वी. का दुषण ।

पाठ -4,जैन धर्म ही श्रेष्ठ धर्म (तत्त्व संस्कार विभाग)

जैन धर्म ही श्रेष्ठ धर्म

पाठ -5,द्वेष का स्वरूप-मान ऐर क्रोध (तत्त्व संस्कार विभाग)

द्वेष का स्वरूप-मान ऐर क्रोध ।

कथा विभाग

कथा-1, महाराजा मेघरथ (कथा विभाग)

महाराजा मेघरथ ।

कथा-2, रोहिणेय चोर (कथा विभाग)

रोहिणेय चोर ।

कथा-3, शालिभद्र(कथा विभाग)

शालिभद्र ।

कथा-3, धर्मरूचि अणगार(कथा विभाग)

धर्मरूचि अणगार ।

काव्य विभाग

काव्य 1 रत्नाकर पच्चिसी (गाथा 13 से 25 )

(राग : हरिगीत)

काव्य 2 साधु वंदना (पद 1 से 15)

साधु वंदना (पद 1 से 15) ।